Tuesday, 29 December 2015

अटल बिहारी वाजपेयी-(राह कौन सी जाऊँ मैं?)

चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर
चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

सपना जन्मा और मर गया
मधु ऋतु में ही बाग झर गया
तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

दो दिन मिले उधार में
घाटों के व्यापार में
क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं ?

गोपाल कृष्‍ण भट्ट 'आकुल'---(यह शहर)

ति‍नका ति‍नका जोड़ रहा
मानव यहाँ शाम-सहर।
आतंकी साये में पीता
हालाहल यह शहर।

अनजानी सुख की चाहत
संवेदनहीन ज़मीर
इंद्रधनुषी अभि‍लाषायें
बि‍न प्रत्‍यंचा बि‍न तीर
महानगर के चक्रव्‍यूह में
अभि‍मन्‍यु सा वीर
आँखों की कि‍रकि‍री बने
अपना ही कोई सगीर
क़दम क़दम संघर्ष जि‍जीवि‍षा का
दंगल यह शहर।

ढूँढ़ रहा है वो कोना जहाँ
कुछ तो हो एकांत
है उधेड़बुन में हर कोई
पग-पग पर है अशांत
सड़क और फुटपाथ सदा
सहते अति‍क्रम का बोझ
बि‍जली के तारों के झूले
करते तांडव रोज
संजाल बना जंजाल नगर का
कोलाहल यह शहर।

दि‍नकर ने चेहरे की रौनक
दौड़धूप ने अपनापन
लूटा है सबने मि‍लकर
मि‍ट्टी के माधो का धन
पर्णकुटी से गगनचुंबी का
अथक यात्रा सम्‍मोहन
पाँच सि‍तारा चकाचौंध ने
झौंक दि‍या सब मय धड़कन
हृदयहीन एकाकी का है
राजमहल यह शहर।

Thursday, 10 December 2015

कुँअर बेचैन--(ये लफ्ज़ आईने हैं मत इन्हें उछाल के चल)

ये लफ़्ज़ आईने हैं मत इन्हें उछाल के चल,
अदब की राह मिली है तो देखभाल के चल ।

कहे जो तुझसे उसे सुन, अमल भी कर उस पर,
ग़ज़ल की बात है उसको न ऐसे टाल के चल ।

सभी के काम में आएँगे वक़्त पड़ने पर,
तू अपने सारे तजुर्बे ग़ज़ल में ढाल के चल ।

मिली है ज़िन्दगी तुझको इसी ही मकसद से,
सँभाल खुद को भी औरों को भी सँभाल के चल ।

कि उसके दर पे बिना माँगे सब ही मिलता है,
चला है रब कि तरफ़ तो बिना सवाल के चल ।

अगर ये पाँव में होते तो चल भी सकता था,
ये शूल दिल में चुभे हैं इन्हें निकाल के चल ।

तुझे भी चाह उजाले कि है, मुझे भी 'कुँअर'
बुझे चिराग कहीं हों तो उनको बाल के चल ।

कमलानंद सिंह 'साहित्य सरोज'--(मानुष जन्म महा दुखदाई)

मानुष जन्म महा दुखदाई ।
सुख नहिं पावत धनी रंक कोउ कोटिन किये उपाई ।
रोग सदन यह तन मल पूरे छन में जात नसाई ॥
आशा चक्र बँधे बिन मारग दिवस रैनि भरमाई ।
पापिनि शापिनि चिन्ता व्यापे घेरि डसत नित आई ।
विषै से सुखत देह और जग कन्टक सम दरसाई ॥
मातु पिता दारा सुत दुहिता मित्र बन्धु गण भाई ।
खान पान लागत नहिं नीको प्रिय अप्रिय भय जाई ॥
हरि स्तुति के सार एकही माया जाल छोड़ाई ।
भजहु ‘सरोज’ नन्द नन्दन पद त्यागि कपट कुटिलाई ॥

Monday, 7 December 2015

रामधारी सिंह "दिनकर"---(वसन्त के नाम पर)

१.
प्रात जगाता शिशु-वसन्त को नव गुलाब दे-दे ताली।
तितली बनी देव की कविता वन-वन उड़ती मतवाली।

सुन्दरता को जगी देखकर,
जी करता मैं भी कुछ गाऊॅं;
मैं भी आज प्रकृति-पूजन में,
निज कविता के दीप जलाऊॅं।

ठोकर मार भाग्य को फोडूँ
जड़ जीवन तज कर उड़ जाऊॅं;
उतरी कभी न भू पर जो छवि,
जग को उसका रूप दिखाऊॅं।

स्वप्न-बीच जो कुछ सुन्दर हो उसे सत्य में व्याप्त करूँ।
और सत्य तनु के कुत्सित मल का अस्तित्व समाप्त करूँ।

२.

कलम उठी कविता लिखने को,
अन्तस्तल में ज्वार उठा रे!
सहसा नाम पकड़ कायर का
पश्चिम पवन पुकार उठा रे!

देखा, शून्य कुँवर का गढ़ है,
झॉंसी की वह शान नहीं है;
दुर्गादास - प्रताप बली का,
प्यारा राजस्थान नहीं है।

जलती नहीं चिता जौहर की,
मुटठी में बलिदान नहीं है;
टेढ़ी मूँछ लिये रण - वन,
फिरना अब तो आसान नहीं है।

समय माँगता मूल्य मुक्ति का,
देगा कौन मांस की बोटी?
पर्वत पर आदर्श मिलेगा,
खायें, चलो घास की रोटी।

चढ़े अश्व पर सेंक रहे रोटी नीचे कर भालों को,
खोज रहा मेवाड़ आज फिर उन अल्हड़ मतवालों को।

३.

बात-बात पर बजीं किरीचें,
जूझ मरे क्षत्रिय खेतों में,
जौहर की जलती चिनगारी
अब भी चमक रही रेतों में।

जाग-जाग ओ थार, बता दे
कण-कण चमक रहा क्यों तेरा?
बता रंच भर ठौर कहाँ वह,
जिस पर शोणित बहा न मेरा?

पी-पी खून आग बढ़ती थी,
सदियों जली होम की ज्वाला;
हॅंस-हॅंस चढ़े सीस, आहुति में
बलिदानों का हुआ उजाला।

सुन्दरियों को सौंप अग्नि पर निकले समय-पुकारों पर,
बाल, वृद्ध औ तरुण विहॅंसते खेल गए तलवारों पर।

४.

हाँ, वसन्त की सरस घड़ी है,
जी करता मैं भी कुछ गाऊॅं;
कवि हूँ, आज प्रकृति-पूजन में
निज कविता के दीप जलाऊॅं।

क्या गाऊॅं? सतलज रोती है,
हाय! खिलीं बेलियाँ किनारे।
भूल गए ऋतुपति, बहते हैं,
यहाँ रुधिर के दिव्य पनारे।

बहनें चीख रहीं रावी-तट,
बिलख रहे बच्चे मतवारे;
फूल-फूल से पूछ रहे हैं,
कब लौटेंगे पिता हमारे?

उफ? वसन्त या मदन-बाण है?
वन-वन रूप-ज्वार आया है।
सिहर रही वसुधा रह-रह कर,
यौवन में उभार आया है।

कसक रही सुन्दरी-आज मधु-ऋतु में मेरे कन्त कहाँ?
दूर द्वीप में प्रतिध्वनि उठती-प्यारी, और वसन्त कहाँ?

महेश चंद्र 'नक्श'--(तस्वीर-ए-ज़िंदगी में रंग भर गए)

तस्वीर-ए-ज़िंदगी में रंग भर गए
वो हासदे जो दिल पे हमारे गुज़र गए

दुनिया से हट के इक नई दुनिया बना सकें
कुछ अहल-ए-आरज़ू इसी हसरत में मर गए

निकला जो क़ाफ़िले से नई जुस्तुजू लिए
कुछ दूर साथ साथ मेरे राह-बर गए

नैरंगियाँ चमन की पशेमान हो गईं
रूख़ पर किसी के आज जो गेसू बिखर गए

फूटी जो उस जबीं से इनायत की इक किरन
मग़मूम आरज़ुओं के चेहरे निखर गए

हर शय से बे-नियाज़ रहे जिन में हुस्न ओ इश्क़
ऐ ज़िंदगी बता के वो लम्हे किधर गए

ऐ ‘नक्श’ कर रहा था जिन्हें ग़र्क़ ना-ख़ुदा
तूफ़ाँ के जोर से वो सफ़ीने उभर गए

Wednesday, 2 December 2015

अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’-(अब ’अमित’ अन्जुमन से जाते हैं0

बाइसे-शौक आजमाते हैं
कितने मज़बूत अपने नाते हैं

रोज़ कश्ती सवाँरता हूँ मैं
कुछ नये छेद हो ही जाते हैं

बाकलमख़ुद बयान था मेरा
अब हवाले कहीं से आते हैं

जिनपे था सख़्त ऐतराज़ उन्हे
उन्हीं नग़्मों को गुनगुनाते हैं

शम्मये-बज़्म ने रुख़ मोड़ लिया
अब ’अमित’ अन्जुमन से जाते हैं

 
बाइसे-शौक = शौक के लिये,

'अफसर' इलाहाबादी--(वही जो हया थी निगार आते आते)

वही जो हया थी निगार आते आते
 बता तू ही अब है वो प्यार आते आते

 न मक़्तल में चल सकती थी तेग़-ए-क़ातिल
 भरे इतने उम्मीद-वार आते आते

 घटी मेरी रोज़ आने जाने से इज़्ज़त
 यहाँ आप खोया वक़ार आते आते

 जगह दो तो मैं उस में तुर्बत बना लूँ
 भरा है जो दिल में ग़ुबार आते आते

 अभी हो ये फ़ितना तो क्या कुछ न होगे
 जवानी के लैल ओ नहार आते आते

 घड़ी हिज्र की काश या रब न आती
 क़यामत के लैल ओ नहार आते आते

 ख़बर देती है याद करता है कोई
 जो बाँधा है हिचकी ने तार आते आते

 फिर आए जो तुम मेहरबाँ जाते जाते
 फिरी गर्दिश-ए-रोज़-गार आते आते

 अज़ल से आबाद को तो जाना था 'अफ़सर'
 चले आए हम उस दयार आते आते

Monday, 30 November 2015

कविता किरण--(दिल पे कोई नशा न तारी हो)

दिल पे कोई नशा न तारी हो,
रूह तक होश में हमारी हो।

चंद फकीरों के संग यारी हो,
मुट्ठी में कायनात सारी हो।

हैं सभी हुस्न की इबादत में,
कौन अख़लाक़ का पुजारी हो।

ज़ख्म भी दे लगाए मरहम भी,
इस कदर नर्म-दिल शिकारी हो।

चाहती हूँ मेरे ख़ुदा मुझ पर
बस तेरे नाम की खुमारी हो।

मौत आए तो बेझिझक चल दें
इतनी पुख़्ता 'किरण' तयारी हो।

कुँअर बहादुर सक्सेना " बेचैन"-(फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया)

फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया,
सबको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।

मैं महकती हुई मिटटी हूँ किसी आँगन की,
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया ।

हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले,
उनको हथियार बनाने पे तुली है दुनिया ।

जिन पे लफ़्ज़ों की नुमाइश के सिवा कुछ भी नहीं,
उनको फ़नकार बनाने पे तुली है दुनिया ।

क्या मुझे ज़ख़्म नए दे के अभी जी न भरा,
क्यों मुझे यार बनाने पे तुली है दुनिया ।

मैं किसी फूल की पंखुरी पे पड़ी शबनम हूँ,
मुझको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।

नन्हे बच्चों से 'कुँअर ' छीन के भोला बचपन,
उनको हुशियार बनाने पे तुली है दुनिया ।

Saturday, 21 November 2015

फ़िराक़ गोरखपुरी-(होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाये हुए-से हैं )

होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाये हुए-से हैं
अहले-नज़र ये चोट भी खाये हुए-से हैं

वो तूर हो कि हश्रे-दिल अफ़्सुर्दगाने-इश्क[1]
हर अंजुमन में आग
लगाये-हुए-से हैं

सुब्हे-अज़ल को यूँ ही ज़रा मिल गयी थी आंख
वो आज तक निगाह
चुराये-हुए-से हैं

हम बदगु़माने-इश्क तेरी बज़्मे - नाज से
जाकर भी तेरे सामने
आये-हुए-से हैं

ये क़ुर्बो-बोद[2] भी हैं सरासर फ़रेबे-हुस्ने
वो आके भी फ़िराक़ न आए-हुए-से हैं
शब्दार्थ:
1-प्रेम में दुखी लोग
2-सा‍मीप्य एवं दूरी

दुष्यंत कुमार---(पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं)

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं

बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं

आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर
आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की अस्लियत
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं

Thursday, 19 November 2015

अजीत सुखदेव---(मयस्सर हो जो लम्हा देखने को )

मयस्सर हो जो लम्हा देखने को
किताबों में है क्या क्या देखने को.

हज़ारों क़द्द-ए-आदम आईने हैं
मगर तरसोगे चेहरा देखने को.

अभी हैं कुछ पुरानी यादगारें
तुम आना शहर मेरा देखने को.

फिर उस के बाद था ख़ामोश पानी
के लोग आए थे दरिया देखने को.

हवा से ही खुलता था अक्सर
मुझे भी इक दरीचा देखने को.

क़यामत का है सन्नाटा फ़ज़ा में
नहीं कोई परिंदा देखने को.

अभी कुछ फूल हैं शाख़ों  पे
मुझे काँटों में उलझा देखने को.

गोपालदास "नीरज"---(हर दर्पन तेरा दर्पन है)

हर दर्पन तेरा दर्पन है, हर चितवन तेरी चितवन है,
मैं किसी नयन का नीर बनूँ, तुझको ही अर्घ्य चढ़ाता हूँ !


नभ की बिंदिया चन्दावाली, भू की अंगिया फूलोंवाली,
सावन की ऋतु झूलोंवाली, फागुन की ऋतु भूलोंवाली,
कजरारी पलकें शरमीली, निंदियारी अलकें उरझीली,
गीतोंवाली गोरी ऊषा, सुधियोंवाली संध्या काली,
हर चूनर तेरी चूनर है, हर चादर तेरी चादर है,
मैं कोई घूँघट छुऊँ, तुझे ही बेपरदा कर आता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


यह कलियों की आनाकानी, यह अलियों की छीनाछोरी,
यह बादल की बूँदाबाँदी, यह बिजली की चोराचारी,
यह काजल का जादू-टोना, यह पायल का शादी-गौना,
यह कोयल की कानाफूँसी, यह मैना की सीनाज़ोरी,
हर क्रीड़ा तेरी क्रीड़ा है, हर पीड़ा तेरी पीड़ा है,
मैं कोई खेलूँ खेल, दाँव तेरे ही साथ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


तपसिन कुटियाँ, बैरिन बगियाँ, निर्धन खंडहर, धनवान महल,
शौकीन सड़क, गमग़ीन गली, टेढ़े-मेढ़े गढ़, गेह सरल,
रोते दर, हँसती दीवारें नीची छत, ऊँची मीनारें,
मरघट की बूढ़ी नीरवता, मेलों की क्वाँरी चहल-पहल,
हर देहरी तेरी देहरी है, हर खिड़की तेरी खिड़की है,
मैं किसी भवन को नमन करूँ, तुझको ही शीश झुकाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


पानी का स्वर रिमझिम-रिमझिम, माटी का रव रुनझुन-रुनझुन,
बातून जनम की कुनुनमुनुन, खामोश मरण की गुपुनचुपुन,
नटखट बचपन की चलाचली, लाचार बुढ़ापे की थमथम,
दुख का तीखा-तीखा क्रन्दन, सुख का मीठा-मीठा गुंजन,
हर वाणी तेरी वाणी है, हर वीणा तेरी वीणा है,
मैं कोई छेड़ूँ तान, तुझे ही बस आवाज़ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


काले तन या गोरे तन की, मैले मन या उजले मन की,
चाँदी-सोने या चन्दन की, औगुन-गुन की या निर्गुन की,
पावन हो या कि अपावन हो, भावन हो या कि अभावन हो,
पूरब की हो या पश्चिम की, उत्तर की हो या दक्खिन की,
हर मूरत तेरी मूरत है, हर सूरत तेरी सूरत है,
मैं चाहे जिसकी माँग भरूँ, तेरा ही ब्याह रचाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है!!

Tuesday, 10 November 2015

गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल'--(पर्व )

धरती पर उतर आया जैसे सितारों का कारवां
टूटते तारों का उल्कापात सा आभास
आकाश में जाते पटाखों से फूटता प्रकाश
टिमटिमाते दीपों से लगती
झिलमिलाते सितारों की दीप्ति
दूर तक दीपवालियों से नहाई हुई
उज्जवल वीथियाँ
लगती आकाशगंगा सी पगडंडिया
एक अनोखा पर्व
जिसने पैदा कर दिया
पृथ्वी पर एक नया ब्रह्माण्ड
सूर्य, चंद्र और आकाश भी दिग्भ्रमित
सैकडों प्रकाशवर्ष दूर यह कैसा प्रकाश
धरती पर उतर आया आकाश
सितारों को कैसे चुरा लिया पृथ्वी ने मेरे आँगन से
चाँद ने भी सुना कि चुरा लिया है चांदनी को
और अप्रितम सौंदर्य का प्रतिमान बनी है धरा
उसकी चांदनी को ओढे
पीछे पीछे दौड़ा आया क्षितिज के उस पार से सूर्य
किसने किया दर्प चूर उसका
रात में फैला यह अभूतपूर्व उजास
नहीं हो सकता यह चाँद का प्रयास
ओह ! चाँद का प्रतिरूप
धरती का यह अनोखा रूप
पर्वों का लोक पृथ्वी
जहाँ हर ऋतु में नृत्य करती धरा
कभी वासंती, कभी हरीतिमा, कभी श्वेतवसना वसुंधरा
अथक यात्रा में संलग्न धरा
तुम धन्य हो !
अमर रहे
मेरे प्रकाश से कहीं ऊर्जस्वी तुम्हारा यह पर्व
मैं अनंत काल तक दूँगा तुम्हें प्रकाश
चाँद बोला- मैं भी अनंतकाल तक बिखेरूँगा शीतलता
धरा है, तो है हमारा अस्तित्व
हलाहल से भरे रत्नानिधि के आगोश में
नीलवर्ण अस्तित्व
दिनकर के आतप से तप कर
स्वर्णिम बना तुम्हारा अस्तित्व
स्वत्वाधिकार है तुम्हें मनाने का
यह प्रकाश पर्व.

अरुण मित्तल 'अद्भुत'---(ये प्रकाश का अभिनन्दन है)

ये प्रकाश का अभिनन्दन है
अंधकार को दूर भगाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशियों के दीप जलाओ

शुद्ध करो निज मन मंदिर को
क्रोध-अनल लालच-विष छोडो
परहित पर हो अर्पित जीवन
स्वार्थ मोह बंधन सब तोड़ो
जो आँखों पर पड़ा हुआ है
पहले वो अज्ञान उठाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशिओं के दीप जलाओ

जहाँ रौशनी दे न दिखाई
उस पर भी सोचो पल दो पल
वहाँ किसी की आँखों में भी
है आशाओं का शीतल जल
जो जीवन पथ में भटके हैं
उनकी नई राह दिखलाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशियों के दीप जलाओ


नवल ज्योति से नव प्रकाश हो
नई सोच हो नई कल्पना
चहुँ दिशी यश, वैभव, सुख बरसे
पूरा हो जाए हर सपना
जिसमे सभी संग दीखते हों
कुछ ऐसे तस्वीर बनाओ
पहले स्नेह लुटाओ सब पर
फिर खुशियों के दीप जलाओ

Saturday, 7 November 2015

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’---(संध्या)

दिवस का अवसान समीप था
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरू–शिखा पर थी अब राजती
कमलिनी–कुल–वल्लभ की प्रभा

विपिन बीच विहंगम–वृंद का
कल–निनाद विवधिर्त था हुआ
ध्वनिमयी–विविधा–विहगावली
उड़ रही नभ मण्डल मध्य थी

अधिक और हुयी नभ लालिमा
दश दिशा अनुरंजित हो गयी
सकल पादप–पुंज हरीतिमा
अरूणिमा विनिमज्‍जि‍त सी हुयी

झलकने पुलिनो पर भी लगी
गगन के तल की वह लालिमा
सरित और सर के जल में पड़ी
अरूणता अति ही रमणीय थी।।

अचल के शिखरों पर जा चढ़ी
किरण पादप शीश विहारिणी
तरणि बिंब तिरोहित हो चला
गगन मंडल मध्य शनै: शनै:।।

ध्वनिमयी करके गिरि कंदरा
कलित कानन केलि निकुंज को
मुरलि एक बजी इस काल ही
तरणिजा तट राजित कुंज में।।

(यह अंश ‘प्रिय प्रवास’ से लिया गया है)

तरुण भटनागर---(वृक्ष की मौत पर)

वह मिटा,
कि मेरा घर आंगन,
यतीम, गुमनाम बना।

तपी न था कोई,
तभी तो नहीं बना,
वह बोधि वृक्ष।
पर वह,
कड़वा नीम आंगन वाला,
अब चिपका है,
मेरी स्मृति दीवार पर,
जैसे फिल्म वाला पोस्टर।
पोस्टर पर है,
कुछ अधूरे चित्र,
युद्ध में,
बमवषर्कों की सूचना देने वाले,
सायरन की तरह,
सहमा देने वाले।

सूखी डाल पर कोंपल-गीला नव शिशु
पतझर-झाड़ते, झड़ते पल,
मेरा मन-शायद उसकी पुचकार,
भीतर की सूनी-डाल पर गीत सीखती चिडि़या,
मेरी नींद-हवा में उसकी झूमती डालियां,
मस्तक पर टीका-उच्च होकर उसका टेकना आकाश,
सलेटी शाम-उसका चमकता बोरला,
  ़ ़ ़ ़ ़
मैंने नहीं छोड़ीं,
उस दधीचि की हिडडयां
निविर्कार भिक्षा मुझे,
जाने कब लड़ना पड़े,
धूप से।
पर,
किसको पड़ी,
तुम जो नहीं अमेजन के जंगल।
बस एक न ढलने वाला शून्य रह गया है।
जो अकस्मात,
भुला देता है,
आैर मैं सोच पड़ता हंू,
शायद पसरी हों,
आंगन में तेरी छांव,
आैर मैं,
बैठूंगा उसमें,
रोज सुबह की तरह,
पढ़ने अखबार।

Tuesday, 3 November 2015

दुष्यंत कुमार---(ये शफ़क़ शाम हो रही है अब)

ये शफ़क़ शाम हो रही है अब
और हर गाम हो रही है अब

जिस तबाही से लोग बचते थे
वो सरे आम हो रही है अब

अज़मते—मुल्क इस सियासत के
हाथ नीलाम हो रही है अब

शब ग़नीमत थी, लोग कहते हैं
सुब्ह बदनाम हो रही है अब

जो किरन थी किसी दरीचे की
मरक़ज़े बाम हो रही है अब

तिश्ना—लब तेरी फुसफुसाहट भी
एक पैग़ाम हो रही है अब

अनिरुद्ध नीरव---(दिन भर का मैनपाट)

भोर

दूर खड़ी
बौनी घाटियों की
धुन्धवती मांग में
ढरक गया सिन्दूरी पानी

सालवनों की
खोई आकृतियां
उभर गई
दूब बनी चाँदी की खूंटी
छहलाए तरुओं में
चहकन की
एक एक और शाख फूटी।
पंखों के पृष्ठों पर
फिर लिक्खी जाएगी
सुगना के खोज की कहानी,

कानों के कोर
हो गए ठंडे
होठों ने
वाष्प सने अक्षर कह डाले।

छानी पर
कांस के कटोरों में
आज पड़ गए होंगे पाले।

गंधों की पाती से
हीन पवन
राम राम कह गया जुबानी,
॥ ॥ ॥

दोपहर

वन फूलों की
कच्ची क्वांरी खुशबू
ललछौहें पत्तों का प्यार लो,
जंगल का इतना सत्कार लो,

कुंजों में इठलाकर,
लतरों में झूलकर
जी लो
विषवन्त महानगरों को
भूलकर
बाहों में भर लो ये सांवले तने,
पांवों में दूब का दुलार लो,

घुटनों बैठे पत्थर
डालियां प्रणाम सी,
दिगविजयी अहमों पर
व्यंग्य सी विराम सी

झुक झुक स्वीकारो यह गूंजता विनय
चिड़ियों का मंगल आभार लो।

झरने के पानी में
दोनों पग डालकर
कोलाहल
धूल धुआं त्रासदी
खंगाल कर
देखों लहरों की कत्थक मुद्राएं
अंजुरी में फेनिल उपहार लो।

पगडन्डी ने पी है
पैरी की वारुणी,
कोयल ने
आमों की कैरी की वारुणी।

तुम पर भी गहराया दर्द का नशा
हिरनी की आंख का उतार लो,
॥ ॥ ॥
सन्ध्या

धूप के स्वेटर
पहनते हैं पहाड़
धुन्ध डूबी घाटियों में
क्या मिलेगा?

कांपता वन
धार सी पैनी हवाएं
सीत में भीगी हुर्इं
नंगी शिलाएं

कोढ़ से गलते हुए
पत्ते हिमादित
अब अकिंचन डालियों में
क्या मिलेगा?

बादलों के पार तक
गरदन उठाए
हर शिखर है
सूर्य की धूनी रमाए।

ओढ़ कर गुदड़ी हरी
खांसे तराई
धौंकनी सी छातियों में
क्या मिलेगा?
कांपता बछड़ा खड़ा
ठिठुरे हुए थन,
बूंद कब ओला बने
सिहरे कमल वन
हो सके तो
उंगलियां अरिणी बनाओ
ओस भीगी तीलियों में
क्या मिलेगा?
॥ ॥ ॥

रात
ढरक गया नेह
नील ढालों पर
शिखरों की पीर व्योम पंखिनी
पावों में
टूटता रहा सूरज
कांधे चुभती रही मयंकिनी,

भृंग, सिंह,
आंख पांख की बातें
कुतुहल कुछ स्नेह

कुछ संकोच भी,
पीड़ों पर
रीछ पांज के निशान
मन में कुछ
याद के खरोंच भी
विजनीली हवा
कण्व-कन्या सी
पातों पर प्रेमाक्षर अंकिनी,

थन भरे
बथान से अलग बंधे
बछड़ा

खुल जाने की शंका,
ग्वालिन की बेटी
की पीर नई
नैन उनींदे उमर प्रियंका
कड़ुए तेल का
दिया लेकर
गोशाला झांकती सशंकिनी |

Sunday, 18 October 2015

अभिषेक शुक्ला---(दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें)

दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें
फिर उस के बाद तुझे सोचें ये ग़ज़ब भी करें

वो जिस ने शाम के माथे पे हाथ फेरा है
हम उस चराग़-ए-हवा-साज़ का अदब भी करें

सियाहियाँ सी बिखरने लगी हैं सीने में
अब उस सितारा-ए-शब-ताब की तलब भी करें

ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में
वही दुआ जो नज़र कर रही है लब भी करें

कि जैसे ख़्वाब दिखाना तसल्लियाँ देना
कुछ एक काम मोहब्बत में बे-सबब भी करें

मैं जानता हूँ कि ताबीर ही नहीं मुमकिन
वो मेरे ख़्वाब की तशरीह चाहे जब भी करें

शिकस्त-ए-ख़्वाब की मंज़िल भी कब नई है हमें
वही जो करते चले आएँ हैं सो अब भी करें

अमिताभ त्रिपाठी ‘अमित---(हम अपने हक़ से जियादा नज़र नहीं रखते)



हम अपने हक़ से जियादा नज़र नहीं रखते
चिराग़ रखते हैं, शम्सो-क़मर[1] नहीं रखते।

हमने रूहों पे जो दौलत की जकड़ देखी है
डर के मारे ये बला अपने घर नहीं रखते।

है नहीं कुछ भी प ग़ैरत प आँच आये तो
सबने देखा है के कोई कसर नहीं रखते।

इल्म रखते हैं कि इंसान को पहचान सकें
उनकी जेबों को भी नापें, हुनर नहीं रखते।

बराहे-रास्त[2] बताते हैं इरादा अपना
मीठे लफ़्जों में छुपा कर ज़हर नहीं रखते।

हम पहर-पहर बिताते हैं ज़िन्दगी अपनी
अगली पीढ़ी के लिये मालो-ज़र नहीं रखते।

दिल में आये जो उसे कर गु़जरते हैं अक्सर
फ़िज़ूल बातों के अगरो-मगर नहीं रखते।

गो कि आकाश में उड़ते हैं परिंदे लेकिन
वो भी ताउम्र हवा में बसर नहीं रखते।

अपने कन्धों पे ही ढोते हैं ज़िन्दगी अपनी
किसी के शाने[3] पे घबरा के सर नहीं रखते।

कुछ ज़रूरी गुनाह होते हैं हमसे भी कभी
पर उसे शर्म से हम ढाँक कर नहीं रखते।

हर पड़ोसी की ख़बर रखते हैं कोशिश करके
रूसो-अमरीका की कोई ख़बर नहीं रखते।

हाँ ख़ुदा रखते हैं, करते हैं बन्दगी पैहम[4]
मकीने-दिल[5] के लिये और घर नहीं रखते।

घर फ़िराक़ और निराला का, है अक़बर का दियार
’अमित’ के शेर क्या कोई असर नहीं रखते।
शब्दार्थ:

1-सूरज और चन्द्रमा
2-सीधे - सीधे
3-कन्धे
4-लगातार
5-दिल का निवासी।

Monday, 12 October 2015

दुर्गा जी के 108 नाम


सति    Sati One who got burned alive
साध्वी    Saadhvi The Sanguine
भवप्रीता    Bhavaprita One who is loved by the universe
भवानी    Bhavaani The abode of the universe
भवमोचिनी    Bhavamochani The absolver of the universe
आर्य    Aarya Goddess
दुर्गा    Durga The Invincible
जया Jaya The Victorious
अद्या    Aadya The Initial reality
त्रिनेत्रा    Trinetra One who has three-eyes
शूलधारिणी    Shooldharini One who holds a monodent
पिनाकधारिणी Pinaakadharini One who holds the trident of Shiva
चित्रा    Chitra The Picturesque
चंद्रघंटा    Chandraghanta One who has mighty bells
महातपा    Mahatapa With severe penance
मन:    Manah Mind
बुद्धि    Buddhi Intelligence
अहंकारा    Ahankaara One with Pride
चित्तरूपा    Chittarupa One who is in thought-state
चिता:    Chita Death-bed
चितिChiti The thinking mind
सर्वमन्त्रमयी    Sarvamantramayi One who possess all the instruments of thought
सत्ताSatta One who is above all
स्त्यानन्दस्वरूपिनी    Satyanandasvarupini Form of Eternal bliss
अनंता    Ananta One who is Infinite or beyond measure
भवानी    Bhaavini The Beautiful Woman
भाव्या    Bhaavya Represents Future
भव्याBhavya With Magnificence
अभव्या    Abhavya Improper or fear-causing
सद्गतिSadagati Always in motion, bestowing Moksha (salvation)
शाम्भवी    Shaambhavi Consort of Shambhu
देवमाता    Devamata Mother Goddess
चिंता    Chinta Tension
रत्नप्रिया Ratnapriya    Adorned or loved by jewels
सर्वविद्या    Sarvavidya Knowledgeable
दक्षकन्या    Dakshakanya Daughter of Daksha
दक्षयज्ञविनाशिनी    Dakshayajñavinaashini Interrupter of the sacrifice of Daksha
अपर्णा    Aparna One who doesnt eat even leaves while fasting
अनेकवर्णा    Anekavarna One who has many complexions
पाटला Paatala Red in color
पाटलवती    Paatalavati Wearing red-color attire
पट्टाम्बरापरिधाना    Pattaambaraparidhaana Wearing a dress made of leather
कलामंजीरारंजिनी    Kalamanjiiraranjini Wearing a musical anklet
अमेया Ameyaa One who is beyond measure
विक्रमा    Vikrama Violent
क्रूरा    Krrooraa Brutal (on demons)
सुंदरी    Sundari The Gorgeous
सुरसुन्दरी    Sursundari Extremely Beautiful
वनदुर्गाVandurga Goddess of forests
मातंगी    Maatangi Goddess of Matanga
मातंगमुनिपूजिता    Matangamunipujita Worshipped by Sage Matanga
ब्राह्मी    Braahmi Power of God Brahma
महेश्वरीMaaheshvari Power of Lord Mahesha (Shiva)
ऐन्द्री    Aeindri Power of God Indra
कौमारी    Kaumaari The adolescent
वैष्णवीVaishnavi The invincible
चामुंडाChaamunda Slayer of Chanda and Munda(demons)
वाराही    Vaarahi One who rides on Varaah
लक्ष्मी    Lakshmi Goddess of Wealth
परुषाकृति    Purushaakriti One who takes the form of a man
विमिलौत्त्कार्शिनी    Vimalauttkarshini One who provides joy
ज्ञाना    Gyaana Full of Knowledge
क्रिया    Kriya One who is in action
नित्या    Nitya The eternal one
बुद्धिदा    Buddhida The bestower of wisdom
बहुलाBahula One who is in various forms
बहुलप्रेमा    Bahulaprema One who is loved by all
सर्ववाहनवाहना    Sarvavahanavahana One who rides all vehicles
निशुम्भशुम्भहननी    NishumbhaShumbhaHanani Slayer of the demon-brothers Shumbha Nishumbha
महिषासुरमर्दिनी    MahishasuraMardini Slayer of the bull-demon Mahishaasura
मधुकैटभहन्त्री    MadhuKaitabhaHantri Slayer of the demon-duo Madhu and Kaitabha
चंडमुंडविनाशिनी    ChandaMundaVinashini Destroyer of the ferocious asuras Chanda and Munda
सर्वासुरविनाशाSarvasuravinasha Destroyer of all demons
सर्वादानवघातिनी    Sarvadaanavaghaatini Possessing the power to kill all the demons
सर्वाशास्त्रमयी    Sarvashaastramayi One who is deft in all theories
सत्याSatya The truth
सर्वास्त्रधारिणी    Sarvaastradhaarini Possessor of all the missile weapons
अनेकशस्त्रहस्ता    Anekashastrahasta Possessor of many hand weapons
अनेकास्त्रधारनी    AnekastraDhaarini Possessor of many missile weapons
कुमारी    Komaari The beautiful adolescent
एककन्या    Ekakanya The girl child
किशोरी Kaishori The adolescent
युवती Yuvati The Woman
यति Yati Ascetic, one who renounces the world
अप्रौढा    Apraudha One who never gets old
प्रौढा    Praudha One who is old
वृद्धमाता    Vriddhamaata The old mother (loosely)
बलप्रदा    Balaprada The bestower of strength
महोदरी Mahodari One who has huge belly which stores the universe
मुक्तकेशी Muktakesha One who has open tresses
घोररूपा    Ghorarupa Having a fierce outlook
महाबला    Mahaabala Having immense strength
अग्निज्वाला    Agnijwaala One who is poignant like fire
रौद्रमुखी    Raudramukhi One who has a fierce face like destroyer Rudra
कालरात्रि Kaalaratri Goddess who is black like night
तपस्विनी    Tapasvini one who is engaged in penance
नारायणी    Narayani The destructive aspect of Lord Narayana (Brahma)
भद्रकाली    Bhadrakaali Fierce form of Kali
विष्णुमाया    Vishnumaya Spell of Lord Vishnu
जलोदरी    Jalodari Abode of the ethereal universe
शिवदूती    Shivadooti Ambassador of Lord Shiva
कराली    [/size] Karaali The Violent
अनंताAnanta The Infinite
परमेश्वरी    Parameshvari The Ultimate Goddess
कात्यानी    Katyayani One who is worshipped by sage Katyanan
सावित्री    Savitri Daughter of the Sun God Savitr
प्रत्यक्षा    Pratyaksha One who is real
ब्रह्मवादिनी    Brahmavaadini One who is present everywhere

Tuesday, 6 October 2015

दुष्यंत कुमार---(आग जलती रहे )

एक तीखी आँच ने
इस जन्म का हर पल छुआ,
आता हुआ दिन छुआ
हाथों से गुजरता कल छुआ
हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,
फूल-पत्ती, फल छुआ
जो मुझे छूने चली
हर उस हवा का आँचल छुआ
... प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता
आग के संपर्क से
दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में
मैं उबलता रहा पानी-सा
परे हर तर्क से
एक चौथाई उमर
यों खौलते बीती बिना अवकाश
सुख कहाँ
यों भाप बन-बन कर चुका,
रीता, भटकता
छानता आकाश
आह! कैसा कठिन
... कैसा पोच मेरा भाग!
आग चारों और मेरे
आग केवल भाग!
सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,
पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,
वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप
ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!
अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे
जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।

हरिवंशराय बच्चन--(प्याला)

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

१.

कल काल-रात्रि के अंधकार
में थी मेरी सत्ता विलीन,
इस मूर्तिमान जग में महान
था मैं विलुप्त कल रूप-हीं,
          कल मादकता थी भरी नींद
          थी जड़ता से ले रही होड़,
किन सरस करों का परस आज
करता जाग्रत जीवन नवीन ?
          मिट्टी से मधु का पात्र बनूँ--
          किस कुम्भकार का यह निश्चय ?
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

२.

भ्रम भूमि रही थी जन्म-काल,
था भ्रमित हो रहा आसमान,
उस कलावान का कुछ रहस्य
होता फिर कैसे भासमान.
           जब खुली आँख तब हुआ ज्ञात,
           थिर है सब मेरे आसपास;
समझा था सबको भ्रमित किन्तु
भ्रम स्वयं रहा था मैं अजान.
           भ्रम से ही जो उत्पन्न हुआ,
           क्या ज्ञान करेगा वह संचय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

३.

जो रस लेकर आया भू पर
जीवन-आतप ले गया छिन,
खो गया पूर्व गुण,रंग,रूप
हो जग की ज्वाला के अधीन;
           मैं चिल्लाया 'क्यों ले मेरी
           मृदुला करती मुझको कठोर ?'
लपटें बोलीं,'चुप, बजा-ठोंक
लेगी तुझको जगती प्रवीण.'
           यह,लो, मीणा बाज़ार जगा,
           होता है मेरा क्रय-विक्रय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

४.

मुझको न ले सके धन-कुबेर
दिखलाकर अपना ठाट-बाट,
मुझको न ले सके नृपति मोल
दे माल-खज़ाना, राज-पाट,
            अमरों ने अमृत दिखलाया,
            दिखलाया अपना अमर लोक,
ठुकराया मैंने दोनों को
रखकर अपना उन्नत ललाट,
            बिक,मगर,गया मैं मोल बिना
            जब आया मानव सरस ह्रदय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

५.

बस एक बार पूछा जाता,
यदि अमृत से पड़ता पाला;
यदि पात्र हलाहल का बनता,
बस एक बार जाता ढाला;
             चिर जीवन औ' चिर मृत्यु जहाँ,
             लघु जीवन की चिर प्यास कहाँ;
जो फिर-फिर होहों तक जाता
वह तो बस मदिरा का प्याला;
             मेरा घर है अरमानो से
             परिपूर्ण जगत् का मदिरालय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

६.

मैं सखी सुराही का साथी,
सहचर मधुबाला का ललाम;
अपने मानस की मस्ती से
उफनाया करता आठयाम;
               कल क्रूर काल के गलों में
               जाना होगा--इस कारण ही
कुछ और बढा दी है मैंने
अपने जीवन की धूमधाम;
               इन मेरी उलटी चालों पर
               संसार खड़ा करता विस्मय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

७.

मेरे पथ में आ-आ करके
तू पूछ रहा है बार-बार,
'क्यों तू दुनिया के लोगों में
करता है मदिरा का प्रचार ?'
                मैं वाद-विवाद करूँ तुझसे
                अवकाश कहाँ इतना मुझको,
'आनंद करो'--यह व्यंग्य भरी
है किसी दग्ध-उर की पुकार;
                कुछ आग बुझाने को पीते
                ये भी,कर मत इन पर संशय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

८.

मैं देख चुका जा मसजिद में
झुक-झुक मोमिन पढ़ते नमाज़,
पर अपनी इस मधुशाला में
पीता दीवानों का समाज;
                यह पुण्य कृत्य,यह पाप क्रम,
                कह भी दूँ,तो क्या सबूत;
कब कंचन मस्जिद पर बरसा,
कब मदिरालय पर गाज़ गिरी ?
                यह चिर अनादि से प्रश्न उठा
                मैं आज करूँगा क्या निर्णय ?
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

९.

सुनकर आया हूँ मंदिर में
रटते हरिजन थे राम-राम,
पर अपनी इस मधुशाला में
जपते मतवाले जाम-जाम;
                 पंडित मदिरालय से रूठा,
                 मैं कैसे मंदिर से रूठूँ ,
मैं फर्क बाहरी क्या देखूं;
मुझको मस्ती से महज काम.
                 भय-भ्रान्ति भरे जग में दोनों
                 मन को बहलाने के अभिनय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

१०.

संसृति की नाटकशाला में
है पड़ा तुझे बनना ज्ञानी,
है पड़ा तुझे बनना प्याला,
होना मदिरा का अभिमानी;
                  संघर्ष यहाँ किसका किससे,
                  यह तो सब खेल-तमाशा है,
यह देख,यवनिका गिरती है,
समझा कुछ अपनी नादानी !
                  छिप जाएँगे हम दोनों ही
                  लेकर अपना-अपना आशय.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

११.

पल में मृत पीने वाले के
कल से गिर भू पर आऊँगा,
जिस मिट्टी से था मैं निर्मित
उस मिट्टी में मिल जाऊँगा;
                  अधिकार नहीं जिन बातों पर,
                  उन बातों की चिंता करके
अब तक जग ने क्या पाया है,
मैं कर चर्चा क्या पाऊँगा ?
                  मुझको अपना ही जन्म-निधन
                  'है सृष्टि प्रथम,है अंतिम ली.
मिट्टी का तन,मस्ती का मन,
क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

Thursday, 1 October 2015

रामधारी सिंह ‘दिनकर’---(बापू )

संसार पूजता जिन्हें तिलक,
रोली, फूलों के हारों से,
मैं उन्हें पूजता आया हूँ
बापू! अब तक अंगारों से।

अंगार, विभूषण यह उनका
विद्युत पीकर जो आते हैं,
ऊँघती शिखाओं की लौ में
चेतना नयी भर जाते हैं।
उनका किरीट, जो कुहा-भंग
करके प्रचण्ड हुंकारों से,
रोशनी छिटकती है जग में
जिनके शोणित की धारों से।
झेलते वह्नि के वारों को
जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर,
सहते ही नहीं, दिया करते
विष का प्रचण्ड विष से उत्तर।
अंगार हार उनका, जिनकी
सुन हाँक समय रुक जाता है,
आदेश जिधर का देते हैं,
इतिहास उधर झुक जाता है।

नरसी मेहता--(वैष्णव जन तो तेने कहिये जे)

वैष्णव जन तो तेने कहिये जे
पीड़ परायी जाणे रे
पर दुख्खे उपकार करे तोये
मन अभिमान ना आणे रे
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ...
सकळ लोक मान सहुने वंदे
नींदा न करे केनी रे
वाच काछ मन निश्चळ राखे
धन धन जननी तेनी रे
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ...
सम दृष्टी ने तृष्णा त्यागी
पर स्त्री जेने मात रे
जिह्वा थकी असत्य ना बोले
पर धन नव झाली हाथ रे
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ...
मोह माया व्यापे नही जेने
द्रिढ़ वैराग्य जेना मन मान रे
राम नाम सुन ताळी लागी
सकळ तिरथ तेना तन मान रे
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ...
वण लोभी ने कपट- रहित छे
काम क्रोध निवार्या रे
भणे नरसैय्यो तेनुन दर्शन कर्ता
कुळ एकोतेर तारया रे
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ...

Saturday, 26 September 2015

जयशंकर प्रसाद---(अब जागो जीवन के प्रभात)

अब जागो जीवन के प्रभात !
           वसुधा पर ओस बने बिखरे
           हिमकन आँसू जो क्षोभ भरे
           उषा बटोरती अरुण गात !
अब जागो जीवन के प्रभात !
           तम नयनों की ताराएँ सब-
           मुद रही किरण दल में हैं अब,
           चल रहा सुखद यह मलय वात !
अब जागो जीवन के प्रभात !
           रजनी की लाज समेटो तो,
           कलरव से उठ कर भेंटो तो ,
           अरुणाचल में चल रही बात,
अब जागो जीवन के प्रभात !

रामधारी सिंह "दिनकर"--(सौन्दर्य)

निस्सीम शक्ति निज को दर्पण में देख रही,
तुम स्वयं शक्ति हो या दर्पण की छाया हो?

 सौन्दर्य रूप ही नहीं, अदृश्य लहर भी है।
उसका सर्वोत्तम अंश न चित्रित हो सकता।


विश्व में सौन्दर्य की महिमा अगम है
हर तरफ हैं खिल रही फुलवारियाँ।
किन्तु मेरे जानते सब से अपर हैं
रूप की प्रतियोगिता में नारियाँ।

 तुम्हारी माधुरी, शुचिता, प्रभा, लावण्य की समता
अगर करते कभी तो एक केवल पुष्प करते हैं।
तुम्हें जब देखता हूँ, प्राण, जानें, क्यो विकल होते,
न जानें, कल्पना से क्यों जुही के फूल झरते हैं।

 रूप है वह पहला उपहार
प्रकृति जो रमणी को देती,
और है यही वस्तु वह जिसे
छीन सबसे पहले लेती।

Wednesday, 23 September 2015

कैफ़ी आज़मी---(कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है)

कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है

मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है

मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा है

सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिक़-ए-कोनैन शर्मसार सा है

तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है

सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा है

जिसे पुकारिए मिलता है इस खंडहर से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी के इश्तेहार सा है

हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरे मज़ार सा है

 कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

Saturday, 19 September 2015

उदयभानु ‘हंस’--(ख़ुश हूँ के ज़िंदगी ने )

ख़ुश हूँ के ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया
मुझ को सुपुर्द-ए-गर्दिश-ए-अय्याम कर दिया

साक़ी सियाह-ख़ाना-ए-हस्ती में देखना
रौशन चराग़ किस ने सर-ए-शाम कर दिया

पहले मेरे ख़ुलूस को देते रहे फ़रेब
आख़िर मेरे ख़ुलूस को बद-नाम कर दिया

कितनी दुआएँ दूँ तेरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
कितना वसी सिलसिला-ए-दाम कर दिया

वो चश्म-ए-मस्त कितनी ख़बर-दार थी  "हंस "
ख़ुद होश में रही हमें बद-नाम कर दिया.

दुष्यंत कुमार--(लफ़्ज़ एहसास—से छाने लगे, ये तो हद है)

लफ़्ज़ एहसास—से छाने लगे, ये तो हद है
लफ़्ज़ माने भी छुपाने लगे, ये तो हद है

आप दीवार उठाने के लिए आए थे
आप दीवार उठाने लगे, ये तो हद है

ख़ामुशी शोर से सुनते थे कि घबराती है
ख़ामुशी शोर मचाने लगे, ये तो हद है

आदमी होंठ चबाए तो समझ आता है
आदमी छाल चबाने लगे, ये तो हद है

जिस्म पहरावों में छुप जाते थे, पहरावों में—
जिस्म नज़र आने लगे, ये तो हद है

लोग तहज़ीब—ओ—तमद्दुन के सलीक़े सीखे
लोग रोते हुए गाने लगे, ये तो हद है

Wednesday, 16 September 2015

श्री गणेश भजन

सबसे पहल्या थाने मनावा , लम्बोदर महाराज
पधारो कीर्तन में ||
रणत भवन से आयो थे, रिद्धि सिद्धि संग में लाओ ,
भजन में रम जावो थे, सारा काम बनाओ थे ,
विघ्न निवारण आप गजानंद , देवों का सरताज ,
पधारो कीर्तन में ||

दुंद दुन्दाला दुःख हरता थे , थारी महिमा भारी,
मंगल के दाता प्रभुजी, नाम थारो शुभकारी है,
रुनक झुनक थे आवो विनायक , आन संभालो आज,
पधारो कीर्तन में ||

भक्ता बीच पधारो थे, थारा लाड लडावागा,
आदर सहित बिठावागा, चरना धौक लगावागा,
शुभ और लाभ की देने वाले, अरज करो मंजूर,
पधारो कीर्तन में ||
आश भगत ने थारी है .... थारी ...............

गणेश वंदना


अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।

सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥

(अभिप्रेत-अर्थ-सिद्धि-अर्थम् पूजितः यः सुर-असुरैः सर्व-विघ्न-च्छिदे तस्मै गण-अधिपतये नमः ।)


स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् ।

वासरमणिरिव तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ॥

(सः जयति सिन्धुर-वदनः देवः यत्-पाद-पङ्कज-स्मरणम् वासर-मणिः-इव तमसाम् राशीन् नाशयति विघ्नानाम् ।)


गजाननं भूतगणाधिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।

उमासुतं शोकविनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥

(गज-आननम् भूत-गण-अधिसेवितम् कपित्थ-जम्बू-फल-चारु-भक्षणम् उमा-सुतम् शोक-विनाश-कारकम् नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कजम् ।)


यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोः यतः सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः ।

यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

(यतः बुद्धिः-अज्ञान-नाशः मुमुक्षोः यतः सम्पदः भक्त-सन्तोषिकाः स्युः यतः विघ्न-नाशः यतः कार्य-सिद्धिः सदा तम् गणेशम् नमामः भजामः ।)

Monday, 14 September 2015

किशोर कल्पनाकांत---(मैं तो भजन भाव हूँ! )

मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !
मुझ में ध्वनित शब्द नाद को साधो, तुम अपनाओ !

में न कभी परिभाषित होता, 'मैं' को 'मैं' ही जानो !
भजनभाव में विह्वल हो कर,'मैं' को तुम अनुमानों !
सुनाने वाला मिले न कोई, 'मैं' को बैठ सुनाओ !
मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !


भव उत्पीडित सकल जगत है घोर भयावह भाथी !
निविड़-निभृत जीवन में, प्रिय तुम, ढून्ढ रहे हो साथी !
चरैवेति का चाक्छुस चंदन, घिस -घिस माथ लगाओ !
मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !

व्योम-विहग बन उड़ा प्राण जो, कहाँ पहुँच कर थमता ?
छोर-हीन विस्तार व्याप्त है, वह जोगी है रमता !
अपरा के सम्मोहन में तुम मत उस को उलझाओ !
मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !

तीन काल की त्रिभुवन यात्रा, मैं तो अथक बटोही !
ढून्ढ रहा अपने ही भीतर, 'मैं' को मैं हूँ टोही !
'स्व' को भजन बनाया मैंने, 'स्व' को मत अलगाओ !
मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !

आभा बोधिसत्त्व--(सच)

सच ईंधन की तरह
जलता है,
खदबदाता है अदहन की तरह
कोई कीमियागर उसका धिकना
कम नहीं कर पाता,
उसे जलना पड़ता है हर हाल में
हर कहीं वह होता है मौजूद
वह सोता है
रसोई में, रास्ते में
नमक में घुलता
नदी में डूबता-उतराता
बचने के लिए छटपटाता
जबकि
झूठ
ऊँचे सुरों में चीखता-चिल्लाता चलाता है
अपनी हुकूमत
सच को झूठ करता
ख़ुश रहता है
सदा-सर्वदा

Saturday, 12 September 2015

तिलोक चंद 'महरूम'---(इस का गिला नहीं के दुआ बे-असर गई)

इस का गिला नहीं के दुआ बे-असर गई
इक आह की थी वो भी कहीं जा के मर गई

ऐ हम-नफ़स न पूछ जवानी का माजरा
मौज-ए-नसीम थी इधर आई उधर गई

दाम-ए-ग़म-ए-हयात में उलझा गई उमीद
हम ये समझ रहे थे के एहसान कर गई

इस ज़िंदगी से हम को न दुनिया मिली न दीं
तक़दीर का मुशाहिदा करते गुज़र गई

अंजाम-ए-फ़स्ल-ए-गुल पे नज़र थी वगरना क्यूँ
गुलशन से आह भर के नसीम-ए-सहर गई

बस इतना होश था मुझे रोज़-ए-विदा-ए-दोस्त
वीराना था नज़र में जहाँ तक नज़र गई

हर मौज-ए-आब-ए-सिंध हुई वक़्फ़-ए-पेच-ओ-ताब
‘महरूम’ जब वतन में हमारी ख़बर गई.

ओमप्रकाश चतुर्वेदी --(किसी तट पर)

किसी तट पर नहीं रुकता नदी की धारा का पानी
गुज़र जाता है जैसे वक्त की रफ़्तार का पानी


मैं सारे बादलों में देखता हूँ आग नफ़रत की
कोई भी मेघ बरसाता नहीं है प्यार का पानी


बुझा सकता नहीं जो आदमी की प्यास, तो तय है
भरा है क्षीरसागर में बहुत बेकार का पानी


भड़कते जा रहे व्यभिचार के बदनाम शोलों को
नहीं छूता किसी भी छोर पर आचार का पानी


मोहब्बत की जवां साँसों की गर्मी सह नहीं पाया
वो कितना सर्द है चौपाल की हुंकार का पानी


न कोई दीप ही जलता, न पत्थर ही पिघलता है
उतरता जा रहा सुर ताल की झंकार का पानी


चलो माना बहुत रंगीन हैं दो चार तस्वीरें
मगर सौ चित्र धोये जा रहा बौछार का पानी


सजावट देखकर घर की कहाँ अन्दाज़ होता है
कि हर दीवार में ही मर रहा दीवार का पानी।

Friday, 4 September 2015

भगवान कृष्ण के 108 नाम


1 अचला : भगवान।
2 अच्युत : अचूक प्रभु, या जिसने कभी भूल ना की हो।
3 अद्भुतह : अद्भुत प्रभु।
4 आदिदेव : देवताओं के स्वामी।
5 अदित्या : देवी अदिति के पुत्र।
6 अजंमा : जिनकी शक्ति असीम और अनंत हो।
7 अजया : जीवन और मृत्यु के विजेता।
8 अक्षरा : अविनाशी प्रभु।
9 अम्रुत : अमृत जैसा स्वरूप वाले।
10 अनादिह : सर्वप्रथम हैं जो।
11 आनंद सागर : कृपा करने वाले
12 अनंता : अंतहीन देव
13 अनंतजित : हमेशा विजयी होने वाले।
14 अनया : जिनका कोई स्वामी न हो।
15 अनिरुध्दा : जिनका अवरोध न किया जा सके।
16 अपराजीत : जिन्हें हराया न जा सके।
17 अव्युक्ता : माणभ की तरह स्पष्ट।
18 बालगोपाल : भगवान कृष्ण का बाल रूप।
19 बलि : सर्व शक्तिमान।
20 चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले प्रभु।
21 दानवेंद्रो : वरदान देने वाले।
22 दयालु : करुणा के भंडार।
23 दयानिधि : सब पर दया करने वाले।
24 देवाधिदेव : देवों के देव
25 देवकीनंदन : देवकी के लाल (पुत्र)।
26 देवेश : ईश्वरों के भी ईश्वर
27 धर्माध्यक्ष : धर्म के स्वामी
28 द्वारकाधीश : द्वारका के अधिपति।
29 गोपाल : ग्वालों के साथ खेलने वाले।
30 गोपालप्रिया : ग्वालों के प्रिय
31 गोविंदा : गाय, प्रकृति, भूमि को चाहने वाले।
32 ज्ञानेश्वर : ज्ञान के भगवान
33 हरि : प्रकृति के देवता।
34 हिरंयगर्भा : सबसे शक्तिशाली प्रजापति।
35 ऋषिकेश : सभी इंद्रियों के दाता।
36 जगद्गुरु : ब्रह्मांड के गुरु
37 जगदिशा : सभी के रक्षक
38 जगन्नाथ : ब्रह्मांड के ईश्वर।
39 जनार्धना : सभी को वरदान देने वाले।
40 जयंतह : सभी दुश्मनों को पराजित करने वाले।
41 ज्योतिरादित्या : जिनमें सूर्य की चमक है।
42 कमलनाथ : देवी लक्ष्मी की प्रभु
43 कमलनयन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं।
44 कामसांतक : कंस का वध करने वाले।
45 कंजलोचन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं।
46 केशव :
47 कृष्ण : सांवले रंग वाले।
48 लक्ष्मीकांत : देवी लक्ष्मी की प्रभु।
49 लोकाध्यक्ष : तीनों लोक के स्वामी।
50 मदन : प्रेम के प्रतीक।
51 माधव : ज्ञान के भंडार।
52 मधुसूदन : मधु- दानवों का वध करने वाले।
53 महेंद्र : इन्द्र के स्वामी।
54 मनमोहन : सबका मन मोह लेने वाले।
55 मनोहर : बहुत ही सुंदर रूप रंग वाले प्रभु।
56 मयूर : मुकुट पर मोर- पंख धारण करने वाले भगवान।
57 मोहन : सभी को आकर्षित करने वाले।
58 मुरली : बांसुरी बजाने वाले प्रभु।
59 मुरलीधर : मुरली धारण करने वाले।
60 मुरलीमनोहर : मुरली बजाकर मोहने वाले।
61 नंद्गोपाल : नंद बाबा के पुत्र।
62 नारायन : सबको शरण में लेने वाले।
63 निरंजन : सर्वोत्तम।
64 निर्गुण : जिनमें कोई अवगुण नहीं।
65 पद्महस्ता : जिनके कमल की तरह हाथ हैं।
66 पद्मनाभ : जिनकी कमल के आकार की नाभि हो।
67 परब्रह्मन : परम सत्य।
68 परमात्मा : सभी प्राणियों के प्रभु।
69 परमपुरुष : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले।
70 पार्थसार्थी : अर्जुन के सारथी।
71 प्रजापती : सभी प्राणियों के नाथ।
72 पुंण्य : निर्मल व्यक्तित्व।
73 पुर्शोत्तम : उत्तम पुरुष।
74 रविलोचन : सूर्य जिनका नेत्र है।
75 सहस्राकाश : हजार आंख वाले प्रभु।
76 सहस्रजित : हजारों को जीतने वाले।
77 सहस्रपात : जिनके हजारों पैर हों।
78 साक्षी : समस्त देवों के गवाह।
79 सनातन : जिनका कभी अंत न हो।
80 सर्वजन : सब- कुछ जानने वाले।
81 सर्वपालक : सभी का पालन करने वाले।
82 सर्वेश्वर : समस्त देवों से ऊंचे।
83 सत्यवचन : सत्य कहने वाले।
84 सत्यव्त : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले देव।
85 शंतह : शांत भाव वाले।
86 श्रेष्ट : महान।
87 श्रीकांत : अद्भुत सौंदर्य के स्वामी।
88 श्याम : जिनका रंग सांवला हो।
89 श्यामसुंदर : सांवले रंग में भी सुंदर दिखने वाले।
90 सुदर्शन : रूपवान।
91 सुमेध : सर्वज्ञानी।
92 सुरेशम : सभी जीव- जंतुओं के देव।
93 स्वर्गपति : स्वर्ग के राजा।
94 त्रिविक्रमा : तीनों लोकों के विजेता
95 उपेंद्र : इन्द्र के भाई।
96 वैकुंठनाथ : स्वर्ग के रहने वाले।
97 वर्धमानह : जिनका कोई आकार न हो।
98 वासुदेव : सभी जगह विद्यमान रहने वाले।
99 विष्णु : भगवान विष्णु के स्वरूप।
100 विश्वदक्शिनह : निपुण और कुशल।
101 विश्वकर्मा : ब्रह्मांड के निर्माता
102 विश्वमूर्ति : पूरे ब्रह्मांड का रूप।
103 विश्वरुपा : ब्रह्मांड- हित के लिए रूप धारण करने वाले।
104 विश्वात्मा : ब्रह्मांड की आत्मा।
105 वृषपर्व : धर्म के भगवान।
106 यदवेंद्रा : यादव वंश के मुखिया।
107 योगि : प्रमुख गुरु।
108 योगिनाम्पति : योगियों के स्वामी।

 कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च ।
नन्दगोप कुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥

श्री कृष्ण चालीसा

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

जय यदुनंदन जय जगवंदन।जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नटनागर, नाग नथइया॥ कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥
मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥
सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥

Thursday, 3 September 2015

आनंद कुमार द्विवेदी---(न ही कोई दरख़्त हूँ न सायबान हूँ)

न ही कोई दरख़्त हूँ न सायबान हूँ
बस्ती से जरा दूर का तनहा मकान हूँ
चाहे जिधर से देखिये बदशक्ल लगूंगा
मैं जिंदगी की चोट का ताज़ा निशान हूँ
कैसे कहूं कि मेरा तवक्को करो जनाब
मैं खुद किसी गवाह का पलटा बयान हूँ
आँखों के सामने ही मेरा क़त्ल हो गया
मुझको यकीन था मैं बड़ा सावधान हूँ
तेरी नसीहतों का असर है या खौफ है
मुंह में जुबान भी है, मगर बेजुबान हूँ
बोई फसल ख़ुशी की ग़म कैसे लहलहाए
या तू ख़ुदा है, या मैं अनाड़ी किसान हूँ
एक बार आके देख तो ‘आनंद’ का हुनर
लाचार परिंदों का, हसीं आसमान हूँ

अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’---(किसी को महल देता है किसी को घर नहीं देता )

किसी को महल देता है किसी को घर नहीं देता
ये क्या इंसाफ है मालिक? कोई उत्तर नहीं देता
जिन्हे निद्रा नहीं आती पडे़ हैं नर्म गद्दों पर
जो थक चूर हैं श्रम से उन्हे बिस्तर नहीं देता
ये कैसा कर्म जिसका पीढ़ियाँ भुगतान करती हैं
ये क्या मज़हब है जो सबको सही अवसर नहीं देता
तुम्हारी सृष्टि के कितने सुमन भूखे औऽ प्यासे हैं
दयानिधि! इनके प्यालों को कभी क्यों भर नहीं देता
मुझे विश्वास पूरा है, तेरी ताकत औऽ हस्ती पर
तू क्यों इक बार सबको इक बराबर कर नहीं देता

Wednesday, 2 September 2015

संजय मिश्रा 'शौक'--(शहर आदिल है तो मुंसिफ़ की ज़रूरत कैसी )

शहर आदिल है तो मुंसिफ की जरूरत कैसी
कोई मुजरिम ही नहीं है तो अदालत कैसी
काम के बोझ से रहते हैं परीशां हर वक्त
आज के दौर के बच्चों में शरारत कैसी

हमको हिर-फिर के तो रहना है इसी धरती पर
हम अगर शहर बदलते हैं तो हिजरत कैसी
मैंने भी जिसके लिए खुद को गंवाया बरसों
वो मुझे ढूँढने आ जाए तो हैरत कैसी
जिसमें मजदूर को दो वक़्त की रोटी न मिले
वो हुकूमत भी अगर है तो हुकूमत कैसी

माखनलाल चतुर्वेदी--(ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा)

ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा
मेरी सुरत बावली बोली-
उतर न सके प्राण सपनों से,
मुझे एक सपने में ले ले।
मेरा कौन कसाला झेले?

तेर एक-एक सपने पर
सौ-सौ जग न्यौछावर राजा।
छोड़ा तेरा जगत-बखेड़ा
चल उठ, अब सपनों में खेलें?
मेरा कौन कसाला झेले?
देख, देख, उस ओर `मित्र' की
इस बाजू पंकज की दूरी,
और देख उसकी किरनों में
यह हँस-हँस जय माला मेले।
मेरा कौन कसाला झेले?
पंकज का हँसना,
मेरा रो देना,
क्या अपराध हुआ यह?
कि मैं जन्म तुझमें ले आया
उपजा नहीं कीच के ढेले।
मेरा कौन कसाला झेले?
तो भी मैं ऊषा के स्वर में
फूल-फूल मुख-पंकज धोकर
जी, हँस उठी आँसुओं में से
छुपी वेदना में रस घोले।
मेरा कौन कसाला झेले?
कितनी दूर?
कि इतनी दूरी!
ऊगे भले प्रभाकर मेरे,
क्यों ऊगे? जी पहुँच न पाता
यह अभाग अब किससे खेले?
मेरा कौन कसाला झेले?
प्रात: आँसू ढुलकाकर भी
खिली पखुड़ियाँ, पंकज किलके,
मैं भाँवरिया खेल न जानी
अपने साजन से हिल-मिल के।
मेरा कौन कसाला झेले?
दर्पण देखा, यह क्या दीखा?
मेरा चित्र, कि तेरी छाया?
मुसकाहट पर चढ़कर बैरी
रहा बिखेरे चमक के ढेले,
मेरा कौन कसाला झेले?
यह प्रहार? चोखा गठ-बंधन!
चुंबन में यह मीठा दंशन।
`पिये इरादे, खाये संकट'
इतना क्या कम है अपनापन?
बहुत हुआ, ये चिड़ियाँ चहकीं,
ले सपने फूलों में ले ले।
मेरा कौन कसाला झेले?

Sunday, 30 August 2015

'क़मर' मुरादाबादी---(नज़र है जलवा-ए-जानाँ है देखिए क्या हो)

नज़र है जलवा-ए-जानाँ है देखिए क्या हो
शिकस्त-ए-इश्क का इम्कान है देखिए क्या हो

अभी बहार-ए-गुज़िश्ता का गम मिटा भी नहीं
फिर एहतमाम बहाराँ है देखिए क्या हो

कदम उठे भी नहीं बज्म-ए-नाज की जानिब
खयाल अभी से परेशाँ है देखिए क्या हो

किसी की राह में काँटे किसी की राह में फूल
हमारी राह में तूफाँ है देखिए क्या हो

खिरद का जोर है आराइश-ए-गुलिस्ताँ पर
जुनूँ हरीफ-ए-बहाराँ है देखिए क्या हो

जिस एक शाख पे बुनियाद है नशेमन की
वो एक शाख भी लर्जां है देखिए क्या हो

है आज बज्म में फिर इज़्न-ए-आम साकी का
‘कमर’ हनोज मुसलमाँ है देखिए क्या हो

अक्षय उपाध्याय---(धान रोपती स्त्री)

क्यों नहीं गाती तुम गीत हमारे
क्यों नहीं तुम गाती
बजता है संगीत तुम्हारे पूरे शरीर से
आँखें नाचती हैं
पृथ्वी का सबसे ख़ूबसूरत
नृत्य
फिर झील-सी आँखो में
सेवार क्यों नहीं उभरते
एक नहीं कई-कई हाथ सहेजते हैं तुम्हारी आत्मा को
एक नहीं
कई-कई हृदय केवल तुम्हारे लिए धड़कते हैं
क्यों नहीं फिर तुम्हारा सीना
फूल कर पहाड़ होता
प्रेम के माथे पर डूबी हुई
तुम
धूप में अपने बाल कब सुखाओगी
कब गाओगी हमारे गीत
धान रोपती
एक स्त्री
केवल स्त्री नहीं होती
तुम वसंत हो
पूरी पृथ्वी का
तुम स्वप्न हो
पूरी पृथ्वी का
तुम्हारी बाँहों में छटपटाते हैं हम और
सूखते हैं हमारे गीत
वसंत पीते हुए इस मौसम में
क्यों नहीं गाती तुम
क्यों नहीं तुम गाती गीत हमारे ?

Friday, 28 August 2015

कैलाश प्रसाद यादव 'सनातन'--(रक्षाबंधन)

जाति-धर्म के तोड़ता बंधन, फिर भी सबको है भाता।
कांटे भी खिलते फूलों से, जब रक्षाबंधन है आता।।
प्राणवायु नहीं दिखती फिर भी, जीवन उसी से है चलता।
बहन हो कितने दूर भी, फिर भी राज उसी का है चलता।।
जंजीरें भी जकड़ न पाएं, मन इतना चंचल होता।
पल में अवनि, पल में अंबर, पल में सागर में खोता।।
इतने चंचल मन को बांधा, इक रेशम के धागे ने,
हंसते-हंसते खुद बंध जाना, सबके मन को है भाता।
कांटे भी खिलते फूलों से, जब रक्षाबंधन है आता।

अंजू ढड्ढा मिश्र---(मेरा मन पंछी सा)

भाई - बहन का रिश्ता
खट्टा- मीठा , प्यारा -प्यारा
कभी लड़ते, तो कभी झगड़ते ..
एक - दूजे की चीजे भी छुपा देते है..
मम्मी - पापा की नाराजगी से बचने के लिए..
एक दूजे पर इल्जाम भी लगा देते है..
पर जब बारी आती है साथ देने की
तो हमेशा भाई को साथ पाती हूँ
मेरे जीवन के हर छोटे - बड़े
अहं फैसले में भाई ने साथ निभाया है..
हर कदम पर कुछ नया करने की आदत है मुझे..
रुकते नहीं कदम मेरे
पर मेरे कदमों की गति को
भाई ने ही तो बढ़ाया है...
मेरी हर अमूर्त कल्पना को
भाई ने ही मूर्त बनाया है..
जीती थी कल्पनाओं की दुनिया में
उसे भाई ने ही तो हकीकत बनाया है..
कुछ शर्ते ,, कुछ पाबंदी भी रहती है उसकी
पर इनमे झलकता है उसका प्यार
मेरी फिक्र जो करता है वो..
कच्ची डोर का पक्का रिश्ता
है भाई - बहन का रिश्ता
खट्टा- मीठा , प्यारा -प्यारा