Sunday, 30 August 2015

'क़मर' मुरादाबादी---(नज़र है जलवा-ए-जानाँ है देखिए क्या हो)

नज़र है जलवा-ए-जानाँ है देखिए क्या हो
शिकस्त-ए-इश्क का इम्कान है देखिए क्या हो

अभी बहार-ए-गुज़िश्ता का गम मिटा भी नहीं
फिर एहतमाम बहाराँ है देखिए क्या हो

कदम उठे भी नहीं बज्म-ए-नाज की जानिब
खयाल अभी से परेशाँ है देखिए क्या हो

किसी की राह में काँटे किसी की राह में फूल
हमारी राह में तूफाँ है देखिए क्या हो

खिरद का जोर है आराइश-ए-गुलिस्ताँ पर
जुनूँ हरीफ-ए-बहाराँ है देखिए क्या हो

जिस एक शाख पे बुनियाद है नशेमन की
वो एक शाख भी लर्जां है देखिए क्या हो

है आज बज्म में फिर इज़्न-ए-आम साकी का
‘कमर’ हनोज मुसलमाँ है देखिए क्या हो

अक्षय उपाध्याय---(धान रोपती स्त्री)

क्यों नहीं गाती तुम गीत हमारे
क्यों नहीं तुम गाती
बजता है संगीत तुम्हारे पूरे शरीर से
आँखें नाचती हैं
पृथ्वी का सबसे ख़ूबसूरत
नृत्य
फिर झील-सी आँखो में
सेवार क्यों नहीं उभरते
एक नहीं कई-कई हाथ सहेजते हैं तुम्हारी आत्मा को
एक नहीं
कई-कई हृदय केवल तुम्हारे लिए धड़कते हैं
क्यों नहीं फिर तुम्हारा सीना
फूल कर पहाड़ होता
प्रेम के माथे पर डूबी हुई
तुम
धूप में अपने बाल कब सुखाओगी
कब गाओगी हमारे गीत
धान रोपती
एक स्त्री
केवल स्त्री नहीं होती
तुम वसंत हो
पूरी पृथ्वी का
तुम स्वप्न हो
पूरी पृथ्वी का
तुम्हारी बाँहों में छटपटाते हैं हम और
सूखते हैं हमारे गीत
वसंत पीते हुए इस मौसम में
क्यों नहीं गाती तुम
क्यों नहीं तुम गाती गीत हमारे ?

Friday, 28 August 2015

कैलाश प्रसाद यादव 'सनातन'--(रक्षाबंधन)

जाति-धर्म के तोड़ता बंधन, फिर भी सबको है भाता।
कांटे भी खिलते फूलों से, जब रक्षाबंधन है आता।।
प्राणवायु नहीं दिखती फिर भी, जीवन उसी से है चलता।
बहन हो कितने दूर भी, फिर भी राज उसी का है चलता।।
जंजीरें भी जकड़ न पाएं, मन इतना चंचल होता।
पल में अवनि, पल में अंबर, पल में सागर में खोता।।
इतने चंचल मन को बांधा, इक रेशम के धागे ने,
हंसते-हंसते खुद बंध जाना, सबके मन को है भाता।
कांटे भी खिलते फूलों से, जब रक्षाबंधन है आता।

अंजू ढड्ढा मिश्र---(मेरा मन पंछी सा)

भाई - बहन का रिश्ता
खट्टा- मीठा , प्यारा -प्यारा
कभी लड़ते, तो कभी झगड़ते ..
एक - दूजे की चीजे भी छुपा देते है..
मम्मी - पापा की नाराजगी से बचने के लिए..
एक दूजे पर इल्जाम भी लगा देते है..
पर जब बारी आती है साथ देने की
तो हमेशा भाई को साथ पाती हूँ
मेरे जीवन के हर छोटे - बड़े
अहं फैसले में भाई ने साथ निभाया है..
हर कदम पर कुछ नया करने की आदत है मुझे..
रुकते नहीं कदम मेरे
पर मेरे कदमों की गति को
भाई ने ही तो बढ़ाया है...
मेरी हर अमूर्त कल्पना को
भाई ने ही मूर्त बनाया है..
जीती थी कल्पनाओं की दुनिया में
उसे भाई ने ही तो हकीकत बनाया है..
कुछ शर्ते ,, कुछ पाबंदी भी रहती है उसकी
पर इनमे झलकता है उसका प्यार
मेरी फिक्र जो करता है वो..
कच्ची डोर का पक्का रिश्ता
है भाई - बहन का रिश्ता
खट्टा- मीठा , प्यारा -प्यारा

Saturday, 22 August 2015

गोपाल कृष्‍ण भट्ट 'आकुल'--(अंजामे गुलि‍स्‍ताँ क्‍या होगा )

हर शाख़ पे उल्‍लू बैठा है,अंजामे गुलि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?
जि‍सने न सहा हो दर्दे ख़ि‍ज़ाँ,गुलज़ार पशेमाँ क्‍या होगा?

उस बीते युग की बात करें क्‍या,आज़ादी के दीवानों की।
ग़दर बाद गाथाएँ भरी हैं,क्रांति‍वीर परवानों की।
जि‍सने बाँधे कफ़न भाल पर,माताओं ने लाल जने।
अब वो दीवाने परवाने,बीते दि‍न की बात बने।
दादी नानी की वो कहानी, अब वो परि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू------

कांड हादसों घोटालों से,फ़ि‍क्‍िंसग और हवालों से।
लि‍खे जा रहे सफ़्हे ग़दर के बाद अनेकों सालों से।
जब से लोकशाही के घि‍नौने,रूप सामने आने लगे।
क्‍या उम्‍मीद करें जस्‍टि‍स की जस्‍टि‍स ही आँसू बहाने लगे।
भूल गुज़श्‍ता भारत को अब कोई करि‍श्‍मा क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू-----

कभी मानव अंग,कभी मानव बम,कभी मानव तस्‍करी होती है।
मनु की सृष्‍टि‍ में मानवता अब नौ-नौ आँसू रोती है।
हर महकमे बने अभयारण्‍य,हर जगह दरि‍न्‍दगी दि‍खती है।
लुटती हैं बालायें घर में,सड़कों पर जानें गि‍रती हैं।
हर घर उड़ी है नींद कहीं कोई,सुकूँ शबि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू-----

फि‍र होगा कहीं ग़दर,ताण्‍डव,कहीं रणचण्‍डी हुंकारेगी।
जब माँ का दूध लजायेगा,माँ नागि‍न बन फुंकारेगी।
अब टूटे ना क़हर कि‍सी पे,नफ़रत के शैतानों को।
कोई तो ऐलान करो,सही वक्‍़त है यह फ़रमानों को।
नहीं तो बनेंगे हरसू,रेगि‍स्‍तान ख़लि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू-----

जि‍सने न सहा हो दर्दे ख़ि‍ज़ाँ,गुलज़ार पशेमाँ क्‍या होगा?
हर शाख़ पे उल्‍लू बैठा है,अंजामे गुलि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?

उदयभानु ‘हंस’---(जिंदगी फूस की झोपड़ी)

ज़िंदगी फूस की झोंपड़ी है,
रेत की नींव पर जो खड़ी है।

पल दो पल है जगत का तमाशा,
जैसे आकाश में फुलझ़ड़ी है।

कोई तो राम आए कहीं से,
बन के पत्थर अहल्या खड़ी है।

सिर छुपाने का बस है ठिकाना,
वो महल है कि या झोंपड़ी है।

धूप निकलेगी सुख की सुनहरी,
दुख का बादल घड़ी दो घड़ी है।

यों छलकती है विधवा की आँखें.,
मानो सावन की कोई झ़ड़ी है।

हाथ बेटी के हों कैसे पीले
झोंपड़ी तक तो गिरवी पड़ी है।

जिसको कहती है ये दुनिया शादी,
दर असल सोने की हथकड़ी है।

देश की दुर्दशा कौन सोचे,
आजकल सबको अपनी पड़ी है।

मुँह से उनके है अमृत टपकता,
किंतु विष से भरी खोपड़ी है।

विश्व के 'हंस' कवियों से पूछो,
दर्द की उम्र कितनी बड़ी है।

Thursday, 20 August 2015

कैफ़ी आज़मी---(लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में )

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना[1] तेरे शहर में ।
फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में ।

आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में ।

जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटना
कुफ़्र[2] है पथराव से घबराना तेरे शहर में ।

शाहनामे[3] लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर
हर जगह है दफ़्न इक अफ़साना तेरे शहर में ।

कुछ कनीज़ें[4] जो हरीमे-नाज़[5] में हैं बारयाब[6]
माँगती हैं जानो-दिल नज़्राना तेरे शहर में ।

नंगी सड़कों पर भटककर देख, जब मरती है रात
रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में ।
शब्दार्थ
1-मादक लड़खड़ाहट
2-धर्मविरोधी
3-फ़ारसी कवि फ़िरदौसी की अमर रचना
4-दासियाँ
5-प्रेमिका का घर
6-जिसे प्रवेश मिल गया हो

अश्वनी शर्मा---(फूल, गुलशन, चांदनी, गुलज़ार की बातें करें)

फूल, गुलशन, चांदनी, गुलज़ार की बातें करें
रूठकर जाते हुए, दिलदार की बातें करें।

मौत तो आयेगी, उसका क्या गिला शिकवा करें
ज़िन्दगानी ने दिये दिन चार की बातें करें।

आसमां खामोश है, ठहरी हुई है, ये नदी
सर्द आगोशों में, आखें चार की बातें करें।

पूछते हो क्या र्तआरूफ हम तो हैं खानाबदोश
हर गली में डोलते मयख़्वार की बातें करें।

गर यही दीवानगी तुम चाहते हो बारहा
इक कलम औ ख़ून ओ अशआर की बातें करें।

Wednesday, 19 August 2015

कुंवर प्रतापचंद्र ‘आज़ाद’---(क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे)

क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे
दिल वो बेमेह्र कि रोने के बहाने माँगे

अपना ये हाल के जी हार चुके लुट भी चुके
और मुहब्बत वही अन्दाज़ पुराने माँगे

यही दिल था कि तरसता था मरासिम के लिए
अब यही तर्के-तल्लुक़ के बहाने माँगे

हम न होते तो किसी और के चर्चे होते
खल्क़त-ए-शहर तो कहने को फ़साने माँगे

ज़िन्दगी हम तेरे दाग़ों से रहे शर्मिन्दा
और तू है कि सदा आइनेख़ानेमाँगे

दिल किसी हाल पे क़ाने ही नहीं जान-ए- ‘आज़ाद
 मिल गये तुम भी तो क्या और न जाने माँगे



अदम गोंडवी---(ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में )

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर मेंकोठी के ज़ीने से

अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से.

Friday, 14 August 2015

रामधारी सिंह दिनकर ---(बापू)




संसार पूजता जिन्हें तिलक,
रोली, फूलों के हारों से,
मैं उन्हें पूजता आया हूँ
बापू ! अब तक अंगारों से।

अंगार, विभूषण यह उनका
विद्युत पीकर जो आते हैं,
ऊँघती शिखाओं की लौ में
चेतना नयी भर जाते हैं।

उनका किरीट, जो कुहा-भंग
करके प्रचण्ड हुंकारों से,
रोशनी छिटकती है जग में
जिनके शोणित की धारों से।

झेलते वह्नि के वारों को
जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर,
सहते ही नहीं, दिया करते
विष का प्रचण्ड विष से उत्तर।

अंगार हार उनका, जिनकी
सुन हाँक समय रुक जाता है,
आदेश जिधर का देते हैं,
इतिहास उधर झुक जाता है।


Wednesday, 12 August 2015

प्रेम नारायण 'पंकिल'---(चेहरा-ए-सुब्ह नज़र आया रूख़-ए-शाम के बाद)



चेहरा-ए-सुब्ह नज़र आया रूख़-ए-शाम के बाद
सब को पहचान लिया गर्दिश-ए-अय्याम के बाद

मिल गई राह-ए-यक़ीं मंज़िल-ए-औहाम के बाद
जलवे ही जलवे नज़र आए दर ओ बाम के बाद

चाहिए अहल-ए-मोहब्बत को की दीवाना बनें
कोई इल्ज़ाम न आएगा इस इल्ज़ाम के बाद

इम्तिहान-ए-तलब-ए-ख़ाम लिया साक़ी ने
जाम-ए-लब-रेज़ दिया दुर्द-ए-तह-ए-जाम के बाद

हाए क्या चीज़ है ये लुत्फ़-ए-शिकस्ता-पाई
हौसले और बढ़े कोशिश-ए-ना-काम के बाद

ज़िंदगी नाम है इक जोहद-ए-मुसलसल का  'पंकिल'
राह-रव और भी थक जाता है आराम के बाद

गोपालदास "नीरज"--(समय शरमा ही जाएगा)



बूढ़े अंबर से माँगो मत पानी
मत टेरो भिक्षुक को कहकर दानी
धरती की तपन न हुई अगर कम तो
सावन का मौसम आ ही जाएगा

मिट्टी का तिल-तिलकर जलना ही तो
उसका कंकड़ से कंचन होना है
जलना है नहीं अगर जीवन में तो
जीवन मरीज का एक बिछौना है
अंगारों को मनमानी करने दो
लपटों को हर शैतानी करने दो
समझौता न कर लिया गर पतझर से
आँगन फूलों से छा ही जाएगा।
बूढ़े अंबर से...

वे ही मौसम को गीत बनाते जो
मिज़राब पहनते हैं विपदाओं की
हर ख़ुशी उन्हीं को दिल देती है जो
पी जाते हर नाख़ुशी हवाओं की
चिंता क्या जो टूटा हर सपना है
परवाह नहीं जो विश्व न अपना है
तुम ज़रा बाँसुरी में स्वर फूँको तो
पपीहा दरवाजे गा ही जाएगा।
बूढ़े अंबर से...

जो ऋतुओं की तक़दीर बदलते हैं
वे कुछ-कुछ मिलते हैं वीरानों से
दिल तो उनके होते हैं शबनम के
सीने उनके बनते चट्टानों से
हर सुख को हरजाई बन जाने दो,
हर दु:ख को परछाई बन जाने दो,
यदि ओढ़ लिया तुमने ख़ुद शीश कफ़न,
क़ातिल का दिल घबरा ही जाएगा।
बूढ़े अंबर से...

दुनिया क्या है, मौसम की खिड़की पर
सपनों की चमकीली-सी चिलमन है,
परदा गिर जाए तो निशि ही निशि है
परदा उठ जाए तो दिन ही दिन है,
मन के कमरों के दरवाज़े खोलो
कुछ धूप और कुछ आँधी में डोलो
शरमाए पाँव न यदि कुछ काँटों से
बेशरम समय शरमा ही जाएगा।
बूढ़े अंबर से...

Saturday, 8 August 2015

ओम पुरोहित 'कागद'---(सावन को ज़रा खुल के बरसने की दुआ दो)

सावन को ज़रा खुल के बरसने की दुआ दो
हर फूल को गुलशन में महकने की दुआ दो

मन मार के बैठे हैं जो सहमे हुए डर से
उन सारे परिन्दों को चहकने की दुआ दो

वो लोग जो उजड़े हैं फ़सादों से, बला से
लो साथ उन्हें फिर से पनपने की दुआ दो

कुछ लोग जो ख़ुद अपनी निगाहों से गिरे हैं
भटके हैं ख़यालात बदलने की दुआ दो

जिन लोगों ने डरते हुए दरपन नहीं देखा
उनको भी ज़रा सजने-सँवरने की दुआ दो

बादल है के कोहसार पिघलते ही नहीं हैं
 'कागद'  इन्हें अब तो बरसने की दुआ दो

Sunday, 2 August 2015

अथ शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्








नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम:शिवाय ॥ 1 ॥
 
मंदाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय ।
मण्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नम:शिवाय ॥ 2 ॥
 
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय बृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नम:शिवाय ॥ 3 ॥
 
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नम:शिवाय ॥ 4 ॥
 
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नम:शिवाय ॥ 5 ॥
 
पञ्चाक्षरिमदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥ 6 ॥

Saturday, 1 August 2015

कृष्ण बिहारी 'नूर'--(चराग़-ए-सब्र)

कमान-ए-ज़ुल्म वो दस्ते ख़ता से मिलती है,
गले वो फूल की खुशबु हवा से मिलती है ।

बिखर रही है फ़ज़ा में अज़ान की शबनम,
वो रूहे लहन-ए-मुहम्मद सबा से मिलती है ।

समन्दरों को सुखा दे जो हिद्दत-ए-लब से,
हमें वो तशनालबी नैनवा से मिलती है ।

वफ़ा के दश्त में कासिम को देख लो सरवर,
फसील-ए-जिस्म तुम्हारी क़बा से मिलती है ।

चराग़-ए-सब्र को तनवीर बांटने के लिए,
बस एक रात की मोहलत जफा से मिलती है ।

बस एक वफ़ा की महक है जो चन्द प्यासों को,
फुरात तेरे किनारे हवा से मिलती है ।

कहा हुसैन ने मुझको छिपा लिया अम्मा,
यह रेत कितनी तुम्हारी रिदा से मिलती है ।।

उज्जवला ज्योति तिग्गा---(धरती के अनाम योद्धा)

इतना तो तय है कि
सब कुछ के बावजूद
हम जिएँगे जंगली घास बनकर
पनपेंगे / खिलेंगे जंगली फूलों-सा
हर कहीं / सब ओर
मुर्झाने / सूख जाने / रौंदे जाने
कुचले जाने / मसले जाने पर भी
बार-बार,मचलती है कहीं
खिलते रहने और पनपने की
कोई ज़िद्दी-सी धुन
मन की अन्धेरी गहरी
गुफ़ाओं / कन्दराओं मे
बिछे रहेंगे / डटे रहेंगे
धरती के सीने पर
हरियाली की चादर बन
डटे रहेंगे सीमान्तों पर / युद्धभूमि पर
धरती के अनाम योद्धा बन
हम सभी समय के अन्तिम छोर तक