Thursday, 25 February 2016

अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’--(बहुत गुमनामों में शामिल एक नाम अपना भी है)


बहुत गुमनामों में शामिल एक नाम अपना भी है
इल्मे-नाकामी[1] में हासिल इक मक़ाम[2] अपना भी है

गौर करने के लिये भी कुछ न कुछ मिल जायेगा
हाले-दिल पर हक़ के बातिल[3] इक कलाम[4] अपना भी है

मेहरबाँ[5] भी हैं बहुत और कद्रदाँ[6] भी हैं बहुत
हो कभी ज़र्रानवाज़ी[7] इन्तेजाम अपना भी है

कब हुज़ूरे-वक़्त को फ़ुरसत मिलेगी देखिये
मुश्त-ए-दरबान[8] तक पहुँचा सलाम अपना भी है

चलिये मैं भी साथ चलता हूँ सफ़र कट जायेगा
आप की तक़रीर[9] के पहले पयाम[10] अपना भी है

इक परिन्दे की तरह बस आबो-दाने[11] की तलाश
जिन्दगी का यह तरीका सुबहो-शाम अपना भी है

घर की चौखट तक मेरा ही हुक़्म चलता है ’अमित’
मिल्कीयत[12] छोटी सही लेकिन निज़ाम[13] अपना भी है
शब्दार्थ:
1-असफलता की विद्या
2-स्थान
3-सच या झूठ
4-वाणी या वचन
5-दयालु
6-गुणग्राहक
7-दीनदयालुता
8-दरबान की मुट्ठी
9-भाषण या उपदेश
10-संदेश
11-अन्न-जल
12-जायेदाद
13-शासनव्यवस्था या प्रबन्धतन्त्र

पंडित बृज मोहन दातातर्या कैफ़ी---(लुत्फ़ हो हश्र में कुछ बात बनाए न बने)

लुत्फ़ हो हश्र में कुछ बात बनाए न बने
आँख भी शौख़ सितम-गर से चुराए न बने

मुझ को उठवा तो दिया उस ने भरी महफ़िल से
कौन था ये कोई पूछे तो बताए न बने

बात सारी ये है वो ज़िद पे अड़े बैठे हैं
याद की भूल हो तो लाख जताए न बने

तुम से अब क्या कहें वो चीज़ है दाग़-ए-ग़म-ए-इश्क़
कि छुपाए न छुपे और दिखाए न बने

सीधी बातों पे है मतलूब सनद और सुबूत
हैं वो कज-बहस ज़ुबाँ उन से मिलाए न बने

फ़तह का राज़ है साबित क़दमी और हिम्मत
काम भी है कोई ऐसा की बनाए न बने

बात वो कह गए आए भी तो किस तरह यक़ीं
और सहर इस में कुछ ऐसा है बुलाए न बने

बे-कसी की है मुसीबत में शिकायत बे-सूद
कब पड़ा वक़्त की अपने भी पराए न बने

ग़म जो प्यारे से मिले क्यूँ न हो वो भी प्यारा
भूलना भी उसे चाहें तो भुलाए न बने

है नज़र में वो समाँ नक़्श है जिस का दिल पर
दर्द वो नाम है लब तक जिसे लाए न बने

बे-ख़ुदी का है जहाँ बे-असर-ए-नाज़ ओ नियाज़
सरकशी भी न चले सर भी झुकाए न बने

आह-ए-सर्द और भी भड़काती है शोला दिल में
ये दिया वो है जो फूँकों से बुझाए न बने

सर्द आज़ाद है दिल रश्क ओ नुमाइश है अबस
ख़ार खाए न बने गुल भी खिलाए न बने

ऐन यक-रंगी है नैरंग तमाशा हर चंद
ये वो उर्यानी का पर्दा है उठाए न बने

बे-ख़ुदी में भी तो ‘कैफ़ी’ की ये ख़ुद-दारी है
हाल-ए-दिल पूछ भी लें वो तो सुनाए न बने

Saturday, 20 February 2016

इन्दिरा वर्मा---(दिल के बे-चैन जज़ीरों में उतर जाएगा)

दिल के बे-चैन जज़ीरों में उतर जाएगा
 दर्द आहों के मुक़द्दर का पता लाएगा

 मेरे बिछड़े हुए लम्हात सजा कर रखना
 वक़्त लफ़्ज़ों में ग़ज़ल बन के ठहर जाएगा

 उस की हर बात जफ़ा-पेशा हुई है अक्सर
 ज़ख़्म का ख़ौफ़ कभी उस को भी दहलाएगा

 वक़्त ख़ामोश है टूटे हुए रिश्तों की तरह
 वो भला कैसे मेरे दिल की ख़बर पाएगा

 शाम-ए-ग़म आज भी गुज़री है हसीं ख़्वाबों में
 ग़म-ए-जानाँ तो मोहब्बत में सितम ढाएगा

 दिल मेरा आज जफ़ाओं पे बहुत नाज़ाँ है
 मेरे होंटों पे तबस्सुम ही नज़र आएगा

 उस के मिज़राब से जब राग बनेंगे दीपक
 मेघ चुपके से मेरे दिल पे बरस जाएगा

आनंद कुमार द्विवेदी---(मंज़िल के बाद कौन सफ़र ढूँढ रहा हूँ )

मंज़िल के बाद कौन सफ़र ढूँढ रहा हूँ
अपने से दूर तुझको किधर ढूँढ रहा हूँ

कहने को शहर छोड़कर सहरा में आ गया
पर एक छाँवदार शज़र ढूँढ रहा हूँ

जिसकी नज़र के सामने दुनिया फ़िजूल थी
हर शै में वही एक नज़र ढूँढ रहा हूँ

लाचारियों का हाल तो देखो कि इन दिनों
मैं दुश्मनों में अपनी गुजर ढूँढ रहा हूँ

तालीम हमने पैसे कमाने की दी उन्हें
नाहक नयी पीढ़ी में ग़दर ढूँढ रहा हूँ

जैसे शहर में ढूँढें कोई गाँव वाला घर
मैं मुल्क में गाँधी का असर ढूँढ रहा हूँ

यूँ गुम हुआ कि सारे जहाँ में नहीं मिला
'आनंद' को मैं शामो-सहर ढूँढ रहा हूँ

Thursday, 18 February 2016

'अमानत' लखनवी---(ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ)

ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ सदा
घर अबस हो पूछते मुझ ख़ानमाँ-बर्बाद का

इश्क़-ए-क़द-ए-यार में क्या ना-तवानी का है ज़ोर
ग़श मुझे आया जो साया पड़ गया शमशाद का

ख़ुद-फ़रामोशी तुम्हारी ग़ैर के काम आ गई
याद रखिएगा ज़रा भूले से कहना याद का

ख़त लिखा करते हैं अब वो यक क़लम मुझ को शिकस्त
पेच से दिल तोड़ते हैं आशिक़-ए-ना-शाद का

इश्क़ पेचाँ का चमन में जाल फैला देख कर
बुलबुलों को सर्व पर धोका हुआ सय्याद का

क़ामत-ए-जानाँ से करता है अकड़ कर हम-सरी
हौसला देखे तो कोई सर्व-ए-बे-बुन्याद का

बे-ज़बानी में अमानत की वो हैं गुल-रेज़ियाँ
नातिक़ा हो बंद ऐ दिल बुलबुल-ए-ना-शाद का

अलका सर्वत मिश्रा---(कलम की दादागिरी)

बहुत दिनों के बाद
अब उठने लगी है कलम
देखिए क्या गुल खिलाती है ?

इसके मन में क्या है
अब ये क्या लिखने वाली है,
एक क्षण पहले तक भी
नहीं बताती है !

यह नए शब्द गढ़ती है
नए अर्थ ले आती है
मुश्किलों के वक्त मुझे
विदुर नीति समझाती है.

कहती है -
कण-कण में चेतना है
'जड़' केवल तेरी बुद्धि है
जो नहीं समझती है
प्रकृति का इशारा,
हवा-पानी-मिट्टी की,
 कीमत नहीं जानती है
बेहद शक्तिशाली हैं ये
हारेंगे नहीं तेरे किसी आविष्कार से,
एक ही क्षण लगेगा
उस आविष्कार को मिट्टी होते.

कहती है-
सदियों से लिखती आई हूँ
शिलापट मैं
लाखों करोड़ों इबारतें
सब कुछ ख़त्म होते गये
सिर्फ ये लेख ही बचे हैं.

जाने कितने जीव-जंतु
जाने कैसे- कैसे पेड़-पौधे
किले, इमारतें, महल
सब कुछ मिल जाता है
इसी प्रकृति में
सबसे शक्तिशाली है ये

तुम इसकी रक्षा करो
ये तुम्हें संरक्षित करेगी
पहले भी लिख चुकी हूँ मैं
धर्मो रक्षति रक्षतः
क्यों नहीं आता समझ में, तुम्हें
पढ़ डाली अलमारी भर-भर किताबें
अनगिनत रिसाले
पर तेरी जड़ बुद्धि में
नहीं घुसा अभी तक
कि-
कुदरत उसी की सुरक्षा करती है
जो कुदरत की रक्षा करता है।

Tuesday, 16 February 2016

तुफ़ैल चतुर्वेदी---(रात जागी न कोई चाँद न तारा जागा)

रात जागी न कोई चाँद न तारा जागा
उम्र भर साथ मैं अपने ही अकेला जागा

क़त्ल से पहले ज़बाँ काट दी उसने मेरी
मैं जो तड़पा तो न अपना न पराया जागा

भर गई सात चटक रंगों की लय कमरे में
गुदगुदाया उसे मैंने तो वो हँसता जागा

मैं ख़यालों से तेरे कब रहा ग़ाफ़िल जानाँ
शब में नींद आ भी गई तो तेरा सपना जागा

उसकी भी नींद उड़ी सो नहीं पाया वो भी
मैं वो सहरा हूँ कि जिसके लिये दरिया जागा

दिन को तो तय था मगर ख़्वाब में जागा शब को
यानी मैं जाग के हिस्से के अलावा जागा

फिर वो लौ देने लगे पाँव के छाले मेरे
फिर मेरे सर में तेरी खोज का फ़ित्ना जागा

दिनेश कुमार स्वामी 'शबाब मेरठी'---(अँधेरी शब में हवा से नज़र मिलाते हुए)

अँधेरी शब में हवा से नज़र मिलाते हुए
मैं बुझ न जाऊँ कहीं ख़ुद को आज़माते हुए

वो कौन है मुझे आवाज़ क्यों नहीं देता
मैं सुन रहा हूँ जिसे ख़ुद में गुनगुनाते हुए

मेरे ही साथ मुझे जिसके पास जाना है
वो चल रहा है मुझे रास्ता बताते हुए

अँधेरा ढँकना है रंगीन इश्तिहारों से
उसे ख़्याल था शायद ख़बर लगाते हुए

Monday, 8 February 2016

निदा फ़ाज़ली---(ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा भिकारी क्या)

ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा भिकारी क्या

वो हर दीदार में ज़रदार है गोटा किनारी क्या


ये काटे से नहीं कटते ये बांटे से नहीं बंटते
नदी के पानियों के सामने आरी कटारी क्या


उसी के चलने-फिरने, हंसने-रोने की हैं तस्वीरें
घटा क्या, चाँद क्या, संगीत क्या, बाद-ए-बहारी क्या


किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूँढ उसको
जो चोटी और दाढ़ी में रहे वो दीनदारी क्या


हमारा मीर जी से मुत्तफ़िक़ होना है नामुमकिन
उठाना है जो पत्थर इश्क़ का तो हल्का-भारी क्या

निदा फ़ाज़ली---(अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं)

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों तक
किसको मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं कि किस राहगुज़र के हम हैं

गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं