Tuesday, 29 March 2016

प्रमोद रामावत ’प्रमोद’---(आँख से बाहर निकल कर कोर पर ठहरा रहा)

                                                            (Jeda Villa Painting by Jan Wils )

 
आँख से बाहर निकल कर कोर पर ठहरा रहा ।
ज़िन्दगी पर आँसुओं का, इस तरह पहरा रहा ।

थी ख़ुशी तो ओस का कतरा हवा में घुल गई,
ज़िन्दगी का दर्द से, रिश्ता बड़ा गहरा रहा ।

बस्तियाँ थीं उम्र की, तब थी सफ़र में रौशनी,
फिर अँधेरा ही अन्धेरा, जब तलक सहरा रहा ।

दर्द की एक बाढ़ यूँ, हमको बहा कर ले गई,
या तो हम चीख़े नहीं, या वक़्त ही बहरा रहा ।

श्याम सखा ’श्याम’---(दिल पे हिन्दुस्तान लिखना )

फूल लिखना कि पान लिखना
गेहूँ लिखना कि धान लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल पे मगर हिन्दुस्तान लिखना

वेद लिखना कि पुरान लिखना
सबद लिखना कि कुरान लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल पे मगर हिन्दुस्तान लिखना

सुबह लिखना कि शाम लिखना
रहीम लिखना राम लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल पे मगर हिन्दुस्तान लिखना

मजूर लिखना कि किसान लिखना
बच्चे-बूढ़े या तुम जवान लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल पे मगर हिन्दुस्तान लिखना

गीत गज़ल का उनवान लिखना
तमिल उड़िया जुबान लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल पे मगर हिन्दुस्तान लिखना

जावेद अख़्तर----(मिसाल इसकी कहाँ है )

मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
कि सारे खोने के ग़म पाये हमने पाने में
वो शक्ल पिघली तो हर शै में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में
जो मुंतज़िर[1] न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलट के आने में
लतीफ़[2] था वो तख़य्युल[3] से, ख़्वाब से नाज़ुक
गँवा दिया उसे हमने ही आज़माने में
समझ लिया था कभी एक सराब[4] को दरिया
पर एक सुकून था हमको फ़रेब खाने में
झुका दरख़्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज़ियादा फ़र्क़ नहीं झुक के टूट जाने में
शब्दार्थ:
1 ↑ इंतज़ार में
2 ↑ मज़ेदार
3 ↑ सोच
4 ↑ मरीचिका

अशोक चक्रधर----(परदे हटा के देखो)


ये घर है दर्द का घर, परदे हटा के देखो,
ग़म हैं हंसी के अंदर, परदे हटा के देखो।

लहरों के झाग ही तो, परदे बने हुए हैं,
गहरा बहुत समंदर, परदे हटा के देखो।

चिड़ियों का चहचहाना, पत्तों का सरसराना,
सुनने की चीज़ हैं पर, परदे हटा के देखो।

नभ में उषा की रंगत, सूरज का मुस्कुराना
ये ख़ुशगवार मंज़र, परदे हटा के देखो।

अपराध और सियासत का इस भरी सभा में,
होता हुआ स्वयंवर, परदे हटा के देखो।

इस ओर है धुआं सा, उस ओर है कुहासा,
किरणों की डोर बनकर, परदे हटा के देखो।

ऐ चक्रधर ये माना, हैं ख़ामियां सभी में,
कुछ तो मिलेगा बेहतर, परदे हटा के देखो।

सरूर---(दास्तान-ए-शौक़ कितनी बार)



दास्तान-ए-शौक़ कितनी बार दोहराई गई
सुनने वालों में तवज्जोह की कमी पाई गई

फ़िक्र है सहमी हुई जज़्बा है मुरझाया हुआ
मौज की शोरिश गई दरिया की गहराई गई

हुस्न भी है मसलहत-बीं इश्क़ भी दुनिया-शनास
आप की शोहरत गई यारों की रुसवाई गई

हम तो कहते थे ज़माना ही नहीं जौहर-शनास
ग़ौर से देखा तो अपने में कमी पाई गई

ज़ख़्म मिलते हैं इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल मिलता नहीं
वज़ा-ए-क़ातिल रह गई रस्म-ए-मसीहाई गई

गर्द उड़ाई जो सियासत ने वो आख़िर धुल गई
अहल-ए-दिल की ख़ाक में भी ज़िंदगी पाई गई

मेरी मद्धम लय का जादू अब भी बाक़ी है 'सुरूर'
फ़सल के नग़मे गए मौसम की शहनाई गई

अखिलेश तिवारी---(कहाँ तलक यूँ तमन्ना को दर-ब-दर देखूँ )


कहाँ तलक यूँ तमन्ना को दर-ब-दर देखूँ
सफ़र तमाम करूँ मैं भी अपना घर देखूँ

सुना है मीर से दुनिया है आइनाख़ाना
तो क्यों न फिर इस दुनिया को बन-सँवर देखूँ

छिड़ी है जंग मुझे ले के ख़ुद मेरे भीतर
फलक की बात रखूँ या शकिस्ताँ पर देखूँ

हरेक शय है नज़र में अभी बहुत धुँधली
पहाड़ियों से ज़मीं पर ज़रा उतर देखूँ

तलाश में है उसी दिन से मंज़िल मेरी
मैं ख़ुद में ठहरा हुआ जबसे इक सफ़र देखूँ

मेरे सुकून का कब पास अक्ल ने रक्खा
सहर के साथ ही मैं तपती दोपहर देखूँ

धीरेन्द्र सिंह काफ़िर ---(दस्त-ऐ-ज़मील-ऐ-तरबखेज मेरी माँ के थे)

दस्त-ऐ-ज़मील-ऐ-तरबखेज[1] मेरी माँ के थे
उन हरेक पल वो साथ जो मेरे इम्तहाँ के थे

हरेक सिम्त[2] समेट दी कि हो जाऊँ कामराँ[3]
वगरना कल तक सब कहाँ के हम कहाँ के थे

अहल-ऐ-जहाँ[4]ओ ये पेंच-ओ-ख़म[5] का दम
मुझे गिराने वाले सब मेरे ही कारवाँ[6] के थे

जब तक वो न थी करीब, तो सब थे रकीब
हम तब तक उम्मीदवार खुर-ऐ-गलताँ[7] के थे

आज तो दे रखीं हैं सौ दुकानें किराए पर
कल तक ख़रीदार खुद हम अपनी दुकाँ के थे

शब्दार्थ:

1- ↑ खुशियाँ देने वाले कोमल हाथ
2- ↑ दिशा
3- ↑ सफल
4- ↑ दुनियावाले
5- ↑ दाँव-पेंच
6- ↑ जुलूस
7- ↑ डूबता सूरज

कुँअर बेचैन---(ओ वासंती पवन हमारे घर आना )

बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!
जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!
एक थकन-सी थी नव भाव तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद ख़ुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!
पतझर ही पतझर था मन के मधुबन में
गहरा सन्नाटा-सा था अंतर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर, भावों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरैया बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!

कैफ़ी आज़मी---(मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता)

मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ भी मिल जाये
नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता

अटल बिहारी वाजपेयी----(मैं न चुप हूँ न गाता हूँ)

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

सवेरा है मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पाँव
ओझल गाँव
जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से
मैं देख पाता हूं
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सदर साँसों ने
चिनारों को झुलस डाला,
मगर हिमपात को देती
चुनौती एक दुर्ममाला,

बिखरे नीड़,
विहँसे चीड़,
आँसू हैं न मुस्कानें,
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूँ।
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

Sunday, 20 March 2016

कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो


कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो
इस डूबते हुआ तिनके को सहरा दे दो
कोई मेरी डूबती को कश्ती किनारा दे दो
मुझे भी कोई पतवार और माझी भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो

मै नन्हे पैरो से कितनी दूर चल पाउगा
गिरते , उठते कब तक संभल पाउगा
कोई थामने वाले हाथ मुझे भी दे दो
कोई अपना साया और साथ भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो ……

आस्मां को देखकर कब तक सो जाउगा
तारो मै कब तक अपनों को देखता जाउगा
कुछ परियो के कहानिया मुझे भी दे दो
टूटा तारो वाली किस्मत मुझे भी दे दो
कुछ ख्वाहिशो के पंख मुझे भी दे दो

जयशंकर प्रसाद---(भारत महिमा)

हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार
उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार

जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक
व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक

विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत
सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत

बचाकर बीज रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत
अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ पर हम बढ़े अभीत

सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता विकास
पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास

सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह
दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह

धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद
हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद

विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम
भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम

यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि
मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि

किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं
हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं

जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचंड समीर
खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर

चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न
हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न

हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव
वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा मे रहती थी टेव

वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान
वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान

जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष

जावेद वशिष्ठ---(हर दिल जो है बेताब तो हर इक आँख भरी है )


हर दिल जो है बेताब तो हर इक आँख भरी है
इंसान पे सचमुच कोई उफ़्ताद पड़ी है

रह-रौ भी वही और वही राहबरी भी
मंज़िल का पता है न कहीं राह मिली है

मुद्दत से रही फ़र्श तिरी राहगुज़र में
तब जा के सितारों से कहीं आँख लड़ी है

ऐसा भी कहीं देखा है मय-ख़ाने का दस्तूर
हर चश्म है लबरेज़ हर इक जाम तही है

रूख़्सार-ए-बहाराँ पे चमकती हुई सुर्ख़ी
कहती है कि गुलशन में अभी सुब्ह हुई है

समझा है तू ज़र्रे को फ़क़त ज़र्रा-ए-नाचीज़
छोटी सी ये दुनिया है जो सूरज से बड़ी है

दुनिया में कोई अहल-ए-नज़र ही नहीं बाक़ी
कोताह-निगाही है तिरी कम-नज़री है

मदहोश फ़ज़ा मस्त हवा होश की मत पूछ
वारफ़्तगी-ए-शौक़ है इक गुम-शुदगी है

फ़िराक़ गोरखपुरी--(दयारे-गै़र में सोज़े-वतन की आँच न पूछ)

दयारे-गै़र(1) में सोज़े-वतन की आँच न पूछ
ख़जाँ में सुब्हे-बहारे-चमन की आँच न पूछ

फ़ज़ा है दहकी हुई रक्‍़स में है शोला-ए-गुल
जहाँ वो शोख़ है उस अंजुमन की आँच न पूछ

क़बा में जिस्म है या शोला जेरे-परद-ए-साज़(2)
बदन से लिपटे हुए पैरहन की आँच न पूछ

हिजाब में भी उसे देखना क़यामत है
नक़ाब में भी रुखे-शोला-ज़न की आँच न पूछ

लपक रहे हैं वो शोले कि होंट जलते हैं
न पूछ मौजे-शराबे-कुहन की आँच न पूछ

फ़ि‍राक आइना-दर-आइना है हुस्ने -निगार
सबाहते-चमन-अन्दर-चमन की आँच न पूछ


(1)- दूसरों की गली,( 2)- साज़ के परदे के पीछे

'क़ाबिल' अजमेरी---(तलब की आग किसी शोला-रू से रौशन है)

तलब की आग किसी शोला-रू से रौशन है
खयाल हो के नज़र आरजू से रौशन है

जनम-जनम के अँधेरों को दे रहा है शिकस्त
वो इक चराग के अपने लहू से रौशन है

कहीं हुजूम-ए-हवादिस में खो के रह जाता
जमाल-ए-यार मेरी जुस्तुजू से रौशन है

ये ताबिश-ए-लब-ए-लालीं ये शोला-ए-आवाज़
तमाम बज़्म तेरी गुफ्तुगू से रौशन है

विसाल-ए-यार तो मुमकीन नहीं मगर नासेह
रूख-ए-हयात इसी आरजू से रौशन है

कैफ़ी आज़मी---(कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतशार-सा है )

कभी जमूद[1] कभी सिर्फ़ इंतशार[2]-सा है ।
जहाँ को अपनी तबाही का इंतज़ार-सा है ।
मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़जा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार-सा है ।
मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामने-यज़्दाँ[3] भी तार-तार-सा है ।
सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिके-कोनैन[4] शर्मसार-सा[5] है ।
तमाम जिस्म है बेदार[6], फ़िक्र ख़ाबीदा[7]
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार-सा है ।
सब अपने पाँव पे रख-रखके पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश[8] पे हर आदमी सवार-सा है ।
जिसे पुकारिए मिलता है इक खंडहर-से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी[9] का इश्तहार-सा है ।
हुई तो कैसे बियाबाँ[10] में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरा मज़ार-सा है ।
कोई तो सूद चुकाए, कोई तो ज़िम्मा ले
उस इन्क़लाब का, जो आज तक उधार-सा है ।
शब्दार्थ:
1↑ गतिरोध
2↑ अस्त-व्यस्त
3↑ ख़ुदा का दामन
4↑ सृष्टि का निर्माता
5↑ शर्मिन्दा-सा
6↑ जागृत
7↑ सोई हुई
8↑ कंधा
9↑ अतीत
10↑ जंगल

अमोघ नारायण झा 'अमोघ' ---(फूले वनांत के कांचनार)-----(रचनाकाल : मार्च 1962 )

फूले वनांत के कांचनार !
खेतों के चंचल अंचल से आती रह-रह सुरभित बयार ।
फूले वनांत के कांचनार ।
मिट्टी की गोराई निखरी,
रग-रग में अरुणाई बिखरी,
कामना-कली सिहरी-सिहरी पाकर ओठों पर मधुर भार ।
फूले वनांत के कांचनार !
घासों पर अब छाई लाली,
चरवाहों के स्वर में गाली,
सकुची पगडंडी फैल चली लेकर अपना पूरा प्रसार ।
फूले वनांत के कांचनार !
शाखों से फूटे लाल-लाल,
सेमल के मन के मधु-ज्वाल,
उमड़े पलास के मुक्त हास, गुमसुम है उत्सुक कर्णिकार ।
फूले वनांत के कांचनार !
मंजरियों का मादक रस पी,
बागों में फिर कोयल कूकी,
उत्सव के गीतों से अहरह मुखरित ग्रामों के द्वार-द्वार ।
फूले वनांत के कांचनार !

Tuesday, 15 March 2016

उषा यादव--(सो जाओ अब)

आसमान की छत पर देखो,
तारों की बरसात हो गई।
सो जाओ अब, रात हो गई।
चूं-चूं करती चिड़िया सोई
दानों के सपनों में खोई
ऊंघ रहे बरगद दादा भी
पत्ता हिल न रहा है कोई।
कब तक जागोगी तुम गुड़िया,
यह तो गंदी बात हो गई।
सो जाओ अब, रात हो गई।
खाली करके अपना प्याला,
देखो सोया टॉमी काला,
पूसी की दो आंखों में भी
सुख-सपनों ने डेरा डाला।
टुकुर-टुकुर क्यों ताक रहीं तुम,
जब पेड़ों की पांत सो गई।
सो जाओ अब, रात हो गई।
हौले-हौले आई निंदिया
बस पलकों पे छाई निंदिया,
सपनों का अनमोल खजाना
मुट्ठी में भर लाई निंदिया।
परीलोक की सैर, तुम्हारे
लिए बड़ी सौगात हो गई।
सो जाओ अब, रात हो गई।

अतुल अजनबी--(सफ़र हो शाह का या क़ाफ़िला फ़क़ीरों का)

सफ़र हो शाह का या क़ाफ़िला फ़क़ीरों का
शजर मिज़ाज समझते हैं राहगीरों का

किसी दरख़्त से सीखो सलीक़ा जीने का
जो धूप - छाँव से रिश्ता बनाये रहता है

ये रहबर आज भी कितने पुराने लगते हैं
की पेड़ दूर से रस्ता दिखाने लगते हैं

अजब ख़ुलूस अजब सादगी से करता है
दरख़्त नेकी बड़ी ख़ामुशी से करता है

पत्तों को छोड़ देता है अक्सर खिज़ां के वक़्त
खुदगर्ज़ी ही कुछ ऐसी यहाँ हर शजर में है

Friday, 11 March 2016

चिराग़ जैन---(चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं)

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं

जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं

बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं

मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं

वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं

क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं

जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं

दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं

ये ज़माने की हक़ीक़त है, बदल सकती नहीं
बिल्लियाँ शेरों को सारे गुर सिखाकर मर गईं

दिनेश त्रिपाठी 'शम्स'---(पूछ मत मुझसे कि क्या कैसा हुआ)

पूछ मत मुझसे कि क्या कैसा हुआ
जो हुआ जैसा हुआ अच्छा हुआ
मै भरोसा ले गया बाजार में
मुझको हर व्यापार में घाटा हुआ
जाने कब लौटेगा अपनी राह पर
आदमी है देवता भट्का हुआ
भूल जाता हू मैं अपने गम सभी
देखता हू जब तुझॆ हन्सता हुआ
मानता हू जीत मैं पाया नहीं
मत समझ लेकिन मुझे हारा हुआ
जो अलमबर्दार आजादी का है
खुद वही बन्धन में है जकडा हुआ
प्यार का सूरज न जाने कब उगे
नफ़रतों का हर तरफ़ कुहरा हुआ

Friday, 4 March 2016

जमुना प्रसाद 'राही'---(दयार-ए-संग में रह कर भी शीशा-गर था मैं)

दयार-ए-संग में रह कर भी शीशा-गर था मैं
ज़माना चीख़ रहा था के बे-ख़बर था मैं

लगी थी आँख तो मरयम की गोद का था गुमाँ
खुली जब आँख तो देखा सलीब पर था मैं

अमाँ किसे थे मेरे साए में जो रूकता कोई
ख़ुद अपनी आग में जलता हुआ शजर था मैं

तमाम उम्र न लड़ने का ग़म रहा मुझ को
अजब महाज़ पे हारा हुआ ज़फर था मैं

हवा-ए-वक़्त ने पत्थर बना दिया वरना
लचकती शाख़ से टूटा हुआ समर था मैं

तमाम शहर में जंगल की आग हो जैसे
हवा के दोष पे उड़ती हुई ख़बर था मैं

कृश्न कुमार 'तूर'---(इम्काने-असर दुआ फ़लक़ तक)

इम्काने-असर दुआ फ़लक़ तक
है पर खोले हुमा[1]फ़लक़ तक

कब पैरवी-ए-ज़माना होती
वैसे तो हैं नक़्शे-पा फ़लक़ तक

कुछ कम असरे-जुनूँ न समझो
जाता है ये रास्ता फ़लक़ तक

फेरेगा रुख़ ये जाँ ही लेकर
है सैले-ग़मे फ़ना फ़लक़ तक

हर सम्त अना ज़हूर पर है
रौशनी है क़ुतुब नुमा फ़लक़ तक

बार-आवर हो न हो ज़मीं पर
जाती है मेरी दुआ फ़लक़ तक

इस उम्रे-रवाँ की बात क्या है
है ‘तूर’ गुरेज़-पा फ़लक़ तक

1- एक परिन्दा जिसका साया जिस पर पड़े वो बादशाह बन जाता