Saturday, 19 September 2015

उदयभानु ‘हंस’--(ख़ुश हूँ के ज़िंदगी ने )

ख़ुश हूँ के ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया
मुझ को सुपुर्द-ए-गर्दिश-ए-अय्याम कर दिया

साक़ी सियाह-ख़ाना-ए-हस्ती में देखना
रौशन चराग़ किस ने सर-ए-शाम कर दिया

पहले मेरे ख़ुलूस को देते रहे फ़रेब
आख़िर मेरे ख़ुलूस को बद-नाम कर दिया

कितनी दुआएँ दूँ तेरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
कितना वसी सिलसिला-ए-दाम कर दिया

वो चश्म-ए-मस्त कितनी ख़बर-दार थी  "हंस "
ख़ुद होश में रही हमें बद-नाम कर दिया.

दुष्यंत कुमार--(लफ़्ज़ एहसास—से छाने लगे, ये तो हद है)

लफ़्ज़ एहसास—से छाने लगे, ये तो हद है
लफ़्ज़ माने भी छुपाने लगे, ये तो हद है

आप दीवार उठाने के लिए आए थे
आप दीवार उठाने लगे, ये तो हद है

ख़ामुशी शोर से सुनते थे कि घबराती है
ख़ामुशी शोर मचाने लगे, ये तो हद है

आदमी होंठ चबाए तो समझ आता है
आदमी छाल चबाने लगे, ये तो हद है

जिस्म पहरावों में छुप जाते थे, पहरावों में—
जिस्म नज़र आने लगे, ये तो हद है

लोग तहज़ीब—ओ—तमद्दुन के सलीक़े सीखे
लोग रोते हुए गाने लगे, ये तो हद है

Wednesday, 16 September 2015

श्री गणेश भजन

सबसे पहल्या थाने मनावा , लम्बोदर महाराज
पधारो कीर्तन में ||
रणत भवन से आयो थे, रिद्धि सिद्धि संग में लाओ ,
भजन में रम जावो थे, सारा काम बनाओ थे ,
विघ्न निवारण आप गजानंद , देवों का सरताज ,
पधारो कीर्तन में ||

दुंद दुन्दाला दुःख हरता थे , थारी महिमा भारी,
मंगल के दाता प्रभुजी, नाम थारो शुभकारी है,
रुनक झुनक थे आवो विनायक , आन संभालो आज,
पधारो कीर्तन में ||

भक्ता बीच पधारो थे, थारा लाड लडावागा,
आदर सहित बिठावागा, चरना धौक लगावागा,
शुभ और लाभ की देने वाले, अरज करो मंजूर,
पधारो कीर्तन में ||
आश भगत ने थारी है .... थारी ...............

गणेश वंदना


अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।

सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥

(अभिप्रेत-अर्थ-सिद्धि-अर्थम् पूजितः यः सुर-असुरैः सर्व-विघ्न-च्छिदे तस्मै गण-अधिपतये नमः ।)


स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् ।

वासरमणिरिव तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ॥

(सः जयति सिन्धुर-वदनः देवः यत्-पाद-पङ्कज-स्मरणम् वासर-मणिः-इव तमसाम् राशीन् नाशयति विघ्नानाम् ।)


गजाननं भूतगणाधिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।

उमासुतं शोकविनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥

(गज-आननम् भूत-गण-अधिसेवितम् कपित्थ-जम्बू-फल-चारु-भक्षणम् उमा-सुतम् शोक-विनाश-कारकम् नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कजम् ।)


यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोः यतः सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः ।

यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

(यतः बुद्धिः-अज्ञान-नाशः मुमुक्षोः यतः सम्पदः भक्त-सन्तोषिकाः स्युः यतः विघ्न-नाशः यतः कार्य-सिद्धिः सदा तम् गणेशम् नमामः भजामः ।)

Monday, 14 September 2015

किशोर कल्पनाकांत---(मैं तो भजन भाव हूँ! )

मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !
मुझ में ध्वनित शब्द नाद को साधो, तुम अपनाओ !

में न कभी परिभाषित होता, 'मैं' को 'मैं' ही जानो !
भजनभाव में विह्वल हो कर,'मैं' को तुम अनुमानों !
सुनाने वाला मिले न कोई, 'मैं' को बैठ सुनाओ !
मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !


भव उत्पीडित सकल जगत है घोर भयावह भाथी !
निविड़-निभृत जीवन में, प्रिय तुम, ढून्ढ रहे हो साथी !
चरैवेति का चाक्छुस चंदन, घिस -घिस माथ लगाओ !
मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !

व्योम-विहग बन उड़ा प्राण जो, कहाँ पहुँच कर थमता ?
छोर-हीन विस्तार व्याप्त है, वह जोगी है रमता !
अपरा के सम्मोहन में तुम मत उस को उलझाओ !
मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !

तीन काल की त्रिभुवन यात्रा, मैं तो अथक बटोही !
ढून्ढ रहा अपने ही भीतर, 'मैं' को मैं हूँ टोही !
'स्व' को भजन बनाया मैंने, 'स्व' को मत अलगाओ !
मैं तो भजन भाव हूँ, मन के तंबूरे पर गाओ !

आभा बोधिसत्त्व--(सच)

सच ईंधन की तरह
जलता है,
खदबदाता है अदहन की तरह
कोई कीमियागर उसका धिकना
कम नहीं कर पाता,
उसे जलना पड़ता है हर हाल में
हर कहीं वह होता है मौजूद
वह सोता है
रसोई में, रास्ते में
नमक में घुलता
नदी में डूबता-उतराता
बचने के लिए छटपटाता
जबकि
झूठ
ऊँचे सुरों में चीखता-चिल्लाता चलाता है
अपनी हुकूमत
सच को झूठ करता
ख़ुश रहता है
सदा-सर्वदा

Saturday, 12 September 2015

तिलोक चंद 'महरूम'---(इस का गिला नहीं के दुआ बे-असर गई)

इस का गिला नहीं के दुआ बे-असर गई
इक आह की थी वो भी कहीं जा के मर गई

ऐ हम-नफ़स न पूछ जवानी का माजरा
मौज-ए-नसीम थी इधर आई उधर गई

दाम-ए-ग़म-ए-हयात में उलझा गई उमीद
हम ये समझ रहे थे के एहसान कर गई

इस ज़िंदगी से हम को न दुनिया मिली न दीं
तक़दीर का मुशाहिदा करते गुज़र गई

अंजाम-ए-फ़स्ल-ए-गुल पे नज़र थी वगरना क्यूँ
गुलशन से आह भर के नसीम-ए-सहर गई

बस इतना होश था मुझे रोज़-ए-विदा-ए-दोस्त
वीराना था नज़र में जहाँ तक नज़र गई

हर मौज-ए-आब-ए-सिंध हुई वक़्फ़-ए-पेच-ओ-ताब
‘महरूम’ जब वतन में हमारी ख़बर गई.