Wednesday, 2 December 2015
'अफसर' इलाहाबादी--(वही जो हया थी निगार आते आते)
वही जो हया थी निगार आते आते
बता तू ही अब है वो प्यार आते आते
न मक़्तल में चल सकती थी तेग़-ए-क़ातिल
भरे इतने उम्मीद-वार आते आते
घटी मेरी रोज़ आने जाने से इज़्ज़त
यहाँ आप खोया वक़ार आते आते
जगह दो तो मैं उस में तुर्बत बना लूँ
भरा है जो दिल में ग़ुबार आते आते
अभी हो ये फ़ितना तो क्या कुछ न होगे
जवानी के लैल ओ नहार आते आते
घड़ी हिज्र की काश या रब न आती
क़यामत के लैल ओ नहार आते आते
ख़बर देती है याद करता है कोई
जो बाँधा है हिचकी ने तार आते आते
फिर आए जो तुम मेहरबाँ जाते जाते
फिरी गर्दिश-ए-रोज़-गार आते आते
अज़ल से आबाद को तो जाना था 'अफ़सर'
चले आए हम उस दयार आते आते
बता तू ही अब है वो प्यार आते आते
न मक़्तल में चल सकती थी तेग़-ए-क़ातिल
भरे इतने उम्मीद-वार आते आते
घटी मेरी रोज़ आने जाने से इज़्ज़त
यहाँ आप खोया वक़ार आते आते
जगह दो तो मैं उस में तुर्बत बना लूँ
भरा है जो दिल में ग़ुबार आते आते
अभी हो ये फ़ितना तो क्या कुछ न होगे
जवानी के लैल ओ नहार आते आते
घड़ी हिज्र की काश या रब न आती
क़यामत के लैल ओ नहार आते आते
ख़बर देती है याद करता है कोई
जो बाँधा है हिचकी ने तार आते आते
फिर आए जो तुम मेहरबाँ जाते जाते
फिरी गर्दिश-ए-रोज़-गार आते आते
अज़ल से आबाद को तो जाना था 'अफ़सर'
चले आए हम उस दयार आते आते
Monday, 30 November 2015
कविता किरण--(दिल पे कोई नशा न तारी हो)
दिल पे कोई नशा न तारी हो,
रूह तक होश में हमारी हो।
चंद फकीरों के संग यारी हो,
मुट्ठी में कायनात सारी हो।
हैं सभी हुस्न की इबादत में,
कौन अख़लाक़ का पुजारी हो।
ज़ख्म भी दे लगाए मरहम भी,
इस कदर नर्म-दिल शिकारी हो।
चाहती हूँ मेरे ख़ुदा मुझ पर
बस तेरे नाम की खुमारी हो।
मौत आए तो बेझिझक चल दें
इतनी पुख़्ता 'किरण' तयारी हो।
रूह तक होश में हमारी हो।
चंद फकीरों के संग यारी हो,
मुट्ठी में कायनात सारी हो।
हैं सभी हुस्न की इबादत में,
कौन अख़लाक़ का पुजारी हो।
ज़ख्म भी दे लगाए मरहम भी,
इस कदर नर्म-दिल शिकारी हो।
चाहती हूँ मेरे ख़ुदा मुझ पर
बस तेरे नाम की खुमारी हो।
मौत आए तो बेझिझक चल दें
इतनी पुख़्ता 'किरण' तयारी हो।
कुँअर बहादुर सक्सेना " बेचैन"-(फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया)
फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया,
सबको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।
मैं महकती हुई मिटटी हूँ किसी आँगन की,
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया ।
हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले,
उनको हथियार बनाने पे तुली है दुनिया ।
जिन पे लफ़्ज़ों की नुमाइश के सिवा कुछ भी नहीं,
उनको फ़नकार बनाने पे तुली है दुनिया ।
क्या मुझे ज़ख़्म नए दे के अभी जी न भरा,
क्यों मुझे यार बनाने पे तुली है दुनिया ।
मैं किसी फूल की पंखुरी पे पड़ी शबनम हूँ,
मुझको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।
नन्हे बच्चों से 'कुँअर ' छीन के भोला बचपन,
उनको हुशियार बनाने पे तुली है दुनिया ।
सबको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।
मैं महकती हुई मिटटी हूँ किसी आँगन की,
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया ।
हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले,
उनको हथियार बनाने पे तुली है दुनिया ।
जिन पे लफ़्ज़ों की नुमाइश के सिवा कुछ भी नहीं,
उनको फ़नकार बनाने पे तुली है दुनिया ।
क्या मुझे ज़ख़्म नए दे के अभी जी न भरा,
क्यों मुझे यार बनाने पे तुली है दुनिया ।
मैं किसी फूल की पंखुरी पे पड़ी शबनम हूँ,
मुझको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।
नन्हे बच्चों से 'कुँअर ' छीन के भोला बचपन,
उनको हुशियार बनाने पे तुली है दुनिया ।
Saturday, 21 November 2015
फ़िराक़ गोरखपुरी-(होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाये हुए-से हैं )
होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाये हुए-से हैं
अहले-नज़र ये चोट भी खाये हुए-से हैं
वो तूर हो कि हश्रे-दिल अफ़्सुर्दगाने-इश्क[1]
हर अंजुमन में आग
लगाये-हुए-से हैं
सुब्हे-अज़ल को यूँ ही ज़रा मिल गयी थी आंख
वो आज तक निगाह
चुराये-हुए-से हैं
हम बदगु़माने-इश्क तेरी बज़्मे - नाज से
जाकर भी तेरे सामने
आये-हुए-से हैं
ये क़ुर्बो-बोद[2] भी हैं सरासर फ़रेबे-हुस्ने
वो आके भी फ़िराक़ न आए-हुए-से हैं
शब्दार्थ:
1-प्रेम में दुखी लोग
2-सामीप्य एवं दूरी
अहले-नज़र ये चोट भी खाये हुए-से हैं
वो तूर हो कि हश्रे-दिल अफ़्सुर्दगाने-इश्क[1]
हर अंजुमन में आग
लगाये-हुए-से हैं
सुब्हे-अज़ल को यूँ ही ज़रा मिल गयी थी आंख
वो आज तक निगाह
चुराये-हुए-से हैं
हम बदगु़माने-इश्क तेरी बज़्मे - नाज से
जाकर भी तेरे सामने
आये-हुए-से हैं
ये क़ुर्बो-बोद[2] भी हैं सरासर फ़रेबे-हुस्ने
वो आके भी फ़िराक़ न आए-हुए-से हैं
शब्दार्थ:
1-प्रेम में दुखी लोग
2-सामीप्य एवं दूरी
दुष्यंत कुमार---(पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं)
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं
इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं
बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं
आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं
आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर
आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं
सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की अस्लियत
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं
इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं
बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं
आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं
आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर
आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं
सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की अस्लियत
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं
Thursday, 19 November 2015
अजीत सुखदेव---(मयस्सर हो जो लम्हा देखने को )
मयस्सर हो जो लम्हा देखने को
किताबों में है क्या क्या देखने को.
हज़ारों क़द्द-ए-आदम आईने हैं
मगर तरसोगे चेहरा देखने को.
अभी हैं कुछ पुरानी यादगारें
तुम आना शहर मेरा देखने को.
फिर उस के बाद था ख़ामोश पानी
के लोग आए थे दरिया देखने को.
हवा से ही खुलता था अक्सर
मुझे भी इक दरीचा देखने को.
क़यामत का है सन्नाटा फ़ज़ा में
नहीं कोई परिंदा देखने को.
अभी कुछ फूल हैं शाख़ों पे
मुझे काँटों में उलझा देखने को.
किताबों में है क्या क्या देखने को.
हज़ारों क़द्द-ए-आदम आईने हैं
मगर तरसोगे चेहरा देखने को.
अभी हैं कुछ पुरानी यादगारें
तुम आना शहर मेरा देखने को.
फिर उस के बाद था ख़ामोश पानी
के लोग आए थे दरिया देखने को.
हवा से ही खुलता था अक्सर
मुझे भी इक दरीचा देखने को.
क़यामत का है सन्नाटा फ़ज़ा में
नहीं कोई परिंदा देखने को.
अभी कुछ फूल हैं शाख़ों पे
मुझे काँटों में उलझा देखने को.
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