Saturday, 22 August 2015

गोपाल कृष्‍ण भट्ट 'आकुल'--(अंजामे गुलि‍स्‍ताँ क्‍या होगा )

हर शाख़ पे उल्‍लू बैठा है,अंजामे गुलि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?
जि‍सने न सहा हो दर्दे ख़ि‍ज़ाँ,गुलज़ार पशेमाँ क्‍या होगा?

उस बीते युग की बात करें क्‍या,आज़ादी के दीवानों की।
ग़दर बाद गाथाएँ भरी हैं,क्रांति‍वीर परवानों की।
जि‍सने बाँधे कफ़न भाल पर,माताओं ने लाल जने।
अब वो दीवाने परवाने,बीते दि‍न की बात बने।
दादी नानी की वो कहानी, अब वो परि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू------

कांड हादसों घोटालों से,फ़ि‍क्‍िंसग और हवालों से।
लि‍खे जा रहे सफ़्हे ग़दर के बाद अनेकों सालों से।
जब से लोकशाही के घि‍नौने,रूप सामने आने लगे।
क्‍या उम्‍मीद करें जस्‍टि‍स की जस्‍टि‍स ही आँसू बहाने लगे।
भूल गुज़श्‍ता भारत को अब कोई करि‍श्‍मा क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू-----

कभी मानव अंग,कभी मानव बम,कभी मानव तस्‍करी होती है।
मनु की सृष्‍टि‍ में मानवता अब नौ-नौ आँसू रोती है।
हर महकमे बने अभयारण्‍य,हर जगह दरि‍न्‍दगी दि‍खती है।
लुटती हैं बालायें घर में,सड़कों पर जानें गि‍रती हैं।
हर घर उड़ी है नींद कहीं कोई,सुकूँ शबि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू-----

फि‍र होगा कहीं ग़दर,ताण्‍डव,कहीं रणचण्‍डी हुंकारेगी।
जब माँ का दूध लजायेगा,माँ नागि‍न बन फुंकारेगी।
अब टूटे ना क़हर कि‍सी पे,नफ़रत के शैतानों को।
कोई तो ऐलान करो,सही वक्‍़त है यह फ़रमानों को।
नहीं तो बनेंगे हरसू,रेगि‍स्‍तान ख़लि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू-----

जि‍सने न सहा हो दर्दे ख़ि‍ज़ाँ,गुलज़ार पशेमाँ क्‍या होगा?
हर शाख़ पे उल्‍लू बैठा है,अंजामे गुलि‍स्‍ताँ क्‍या होगा?

उदयभानु ‘हंस’---(जिंदगी फूस की झोपड़ी)

ज़िंदगी फूस की झोंपड़ी है,
रेत की नींव पर जो खड़ी है।

पल दो पल है जगत का तमाशा,
जैसे आकाश में फुलझ़ड़ी है।

कोई तो राम आए कहीं से,
बन के पत्थर अहल्या खड़ी है।

सिर छुपाने का बस है ठिकाना,
वो महल है कि या झोंपड़ी है।

धूप निकलेगी सुख की सुनहरी,
दुख का बादल घड़ी दो घड़ी है।

यों छलकती है विधवा की आँखें.,
मानो सावन की कोई झ़ड़ी है।

हाथ बेटी के हों कैसे पीले
झोंपड़ी तक तो गिरवी पड़ी है।

जिसको कहती है ये दुनिया शादी,
दर असल सोने की हथकड़ी है।

देश की दुर्दशा कौन सोचे,
आजकल सबको अपनी पड़ी है।

मुँह से उनके है अमृत टपकता,
किंतु विष से भरी खोपड़ी है।

विश्व के 'हंस' कवियों से पूछो,
दर्द की उम्र कितनी बड़ी है।

Thursday, 20 August 2015

कैफ़ी आज़मी---(लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में )

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना[1] तेरे शहर में ।
फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में ।

आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में ।

जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटना
कुफ़्र[2] है पथराव से घबराना तेरे शहर में ।

शाहनामे[3] लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर
हर जगह है दफ़्न इक अफ़साना तेरे शहर में ।

कुछ कनीज़ें[4] जो हरीमे-नाज़[5] में हैं बारयाब[6]
माँगती हैं जानो-दिल नज़्राना तेरे शहर में ।

नंगी सड़कों पर भटककर देख, जब मरती है रात
रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में ।
शब्दार्थ
1-मादक लड़खड़ाहट
2-धर्मविरोधी
3-फ़ारसी कवि फ़िरदौसी की अमर रचना
4-दासियाँ
5-प्रेमिका का घर
6-जिसे प्रवेश मिल गया हो

अश्वनी शर्मा---(फूल, गुलशन, चांदनी, गुलज़ार की बातें करें)

फूल, गुलशन, चांदनी, गुलज़ार की बातें करें
रूठकर जाते हुए, दिलदार की बातें करें।

मौत तो आयेगी, उसका क्या गिला शिकवा करें
ज़िन्दगानी ने दिये दिन चार की बातें करें।

आसमां खामोश है, ठहरी हुई है, ये नदी
सर्द आगोशों में, आखें चार की बातें करें।

पूछते हो क्या र्तआरूफ हम तो हैं खानाबदोश
हर गली में डोलते मयख़्वार की बातें करें।

गर यही दीवानगी तुम चाहते हो बारहा
इक कलम औ ख़ून ओ अशआर की बातें करें।

Wednesday, 19 August 2015

कुंवर प्रतापचंद्र ‘आज़ाद’---(क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे)

क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे
दिल वो बेमेह्र कि रोने के बहाने माँगे

अपना ये हाल के जी हार चुके लुट भी चुके
और मुहब्बत वही अन्दाज़ पुराने माँगे

यही दिल था कि तरसता था मरासिम के लिए
अब यही तर्के-तल्लुक़ के बहाने माँगे

हम न होते तो किसी और के चर्चे होते
खल्क़त-ए-शहर तो कहने को फ़साने माँगे

ज़िन्दगी हम तेरे दाग़ों से रहे शर्मिन्दा
और तू है कि सदा आइनेख़ानेमाँगे

दिल किसी हाल पे क़ाने ही नहीं जान-ए- ‘आज़ाद
 मिल गये तुम भी तो क्या और न जाने माँगे



अदम गोंडवी---(ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में )

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर मेंकोठी के ज़ीने से

अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से.

Friday, 14 August 2015

रामधारी सिंह दिनकर ---(बापू)




संसार पूजता जिन्हें तिलक,
रोली, फूलों के हारों से,
मैं उन्हें पूजता आया हूँ
बापू ! अब तक अंगारों से।

अंगार, विभूषण यह उनका
विद्युत पीकर जो आते हैं,
ऊँघती शिखाओं की लौ में
चेतना नयी भर जाते हैं।

उनका किरीट, जो कुहा-भंग
करके प्रचण्ड हुंकारों से,
रोशनी छिटकती है जग में
जिनके शोणित की धारों से।

झेलते वह्नि के वारों को
जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर,
सहते ही नहीं, दिया करते
विष का प्रचण्ड विष से उत्तर।

अंगार हार उनका, जिनकी
सुन हाँक समय रुक जाता है,
आदेश जिधर का देते हैं,
इतिहास उधर झुक जाता है।