Saturday, 26 September 2015

जयशंकर प्रसाद---(अब जागो जीवन के प्रभात)

अब जागो जीवन के प्रभात !
           वसुधा पर ओस बने बिखरे
           हिमकन आँसू जो क्षोभ भरे
           उषा बटोरती अरुण गात !
अब जागो जीवन के प्रभात !
           तम नयनों की ताराएँ सब-
           मुद रही किरण दल में हैं अब,
           चल रहा सुखद यह मलय वात !
अब जागो जीवन के प्रभात !
           रजनी की लाज समेटो तो,
           कलरव से उठ कर भेंटो तो ,
           अरुणाचल में चल रही बात,
अब जागो जीवन के प्रभात !

रामधारी सिंह "दिनकर"--(सौन्दर्य)

निस्सीम शक्ति निज को दर्पण में देख रही,
तुम स्वयं शक्ति हो या दर्पण की छाया हो?

 सौन्दर्य रूप ही नहीं, अदृश्य लहर भी है।
उसका सर्वोत्तम अंश न चित्रित हो सकता।


विश्व में सौन्दर्य की महिमा अगम है
हर तरफ हैं खिल रही फुलवारियाँ।
किन्तु मेरे जानते सब से अपर हैं
रूप की प्रतियोगिता में नारियाँ।

 तुम्हारी माधुरी, शुचिता, प्रभा, लावण्य की समता
अगर करते कभी तो एक केवल पुष्प करते हैं।
तुम्हें जब देखता हूँ, प्राण, जानें, क्यो विकल होते,
न जानें, कल्पना से क्यों जुही के फूल झरते हैं।

 रूप है वह पहला उपहार
प्रकृति जो रमणी को देती,
और है यही वस्तु वह जिसे
छीन सबसे पहले लेती।

Wednesday, 23 September 2015

कैफ़ी आज़मी---(कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है)

कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है

मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है

मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा है

सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिक़-ए-कोनैन शर्मसार सा है

तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है

सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा है

जिसे पुकारिए मिलता है इस खंडहर से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी के इश्तेहार सा है

हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरे मज़ार सा है

 कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

Saturday, 19 September 2015

उदयभानु ‘हंस’--(ख़ुश हूँ के ज़िंदगी ने )

ख़ुश हूँ के ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया
मुझ को सुपुर्द-ए-गर्दिश-ए-अय्याम कर दिया

साक़ी सियाह-ख़ाना-ए-हस्ती में देखना
रौशन चराग़ किस ने सर-ए-शाम कर दिया

पहले मेरे ख़ुलूस को देते रहे फ़रेब
आख़िर मेरे ख़ुलूस को बद-नाम कर दिया

कितनी दुआएँ दूँ तेरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
कितना वसी सिलसिला-ए-दाम कर दिया

वो चश्म-ए-मस्त कितनी ख़बर-दार थी  "हंस "
ख़ुद होश में रही हमें बद-नाम कर दिया.

दुष्यंत कुमार--(लफ़्ज़ एहसास—से छाने लगे, ये तो हद है)

लफ़्ज़ एहसास—से छाने लगे, ये तो हद है
लफ़्ज़ माने भी छुपाने लगे, ये तो हद है

आप दीवार उठाने के लिए आए थे
आप दीवार उठाने लगे, ये तो हद है

ख़ामुशी शोर से सुनते थे कि घबराती है
ख़ामुशी शोर मचाने लगे, ये तो हद है

आदमी होंठ चबाए तो समझ आता है
आदमी छाल चबाने लगे, ये तो हद है

जिस्म पहरावों में छुप जाते थे, पहरावों में—
जिस्म नज़र आने लगे, ये तो हद है

लोग तहज़ीब—ओ—तमद्दुन के सलीक़े सीखे
लोग रोते हुए गाने लगे, ये तो हद है

Wednesday, 16 September 2015

श्री गणेश भजन

सबसे पहल्या थाने मनावा , लम्बोदर महाराज
पधारो कीर्तन में ||
रणत भवन से आयो थे, रिद्धि सिद्धि संग में लाओ ,
भजन में रम जावो थे, सारा काम बनाओ थे ,
विघ्न निवारण आप गजानंद , देवों का सरताज ,
पधारो कीर्तन में ||

दुंद दुन्दाला दुःख हरता थे , थारी महिमा भारी,
मंगल के दाता प्रभुजी, नाम थारो शुभकारी है,
रुनक झुनक थे आवो विनायक , आन संभालो आज,
पधारो कीर्तन में ||

भक्ता बीच पधारो थे, थारा लाड लडावागा,
आदर सहित बिठावागा, चरना धौक लगावागा,
शुभ और लाभ की देने वाले, अरज करो मंजूर,
पधारो कीर्तन में ||
आश भगत ने थारी है .... थारी ...............

गणेश वंदना


अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।

सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥

(अभिप्रेत-अर्थ-सिद्धि-अर्थम् पूजितः यः सुर-असुरैः सर्व-विघ्न-च्छिदे तस्मै गण-अधिपतये नमः ।)


स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् ।

वासरमणिरिव तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ॥

(सः जयति सिन्धुर-वदनः देवः यत्-पाद-पङ्कज-स्मरणम् वासर-मणिः-इव तमसाम् राशीन् नाशयति विघ्नानाम् ।)


गजाननं भूतगणाधिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।

उमासुतं शोकविनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥

(गज-आननम् भूत-गण-अधिसेवितम् कपित्थ-जम्बू-फल-चारु-भक्षणम् उमा-सुतम् शोक-विनाश-कारकम् नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कजम् ।)


यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोः यतः सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः ।

यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

(यतः बुद्धिः-अज्ञान-नाशः मुमुक्षोः यतः सम्पदः भक्त-सन्तोषिकाः स्युः यतः विघ्न-नाशः यतः कार्य-सिद्धिः सदा तम् गणेशम् नमामः भजामः ।)