Monday, 30 November 2015

कविता किरण--(दिल पे कोई नशा न तारी हो)

दिल पे कोई नशा न तारी हो,
रूह तक होश में हमारी हो।

चंद फकीरों के संग यारी हो,
मुट्ठी में कायनात सारी हो।

हैं सभी हुस्न की इबादत में,
कौन अख़लाक़ का पुजारी हो।

ज़ख्म भी दे लगाए मरहम भी,
इस कदर नर्म-दिल शिकारी हो।

चाहती हूँ मेरे ख़ुदा मुझ पर
बस तेरे नाम की खुमारी हो।

मौत आए तो बेझिझक चल दें
इतनी पुख़्ता 'किरण' तयारी हो।

कुँअर बहादुर सक्सेना " बेचैन"-(फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया)

फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया,
सबको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।

मैं महकती हुई मिटटी हूँ किसी आँगन की,
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया ।

हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले,
उनको हथियार बनाने पे तुली है दुनिया ।

जिन पे लफ़्ज़ों की नुमाइश के सिवा कुछ भी नहीं,
उनको फ़नकार बनाने पे तुली है दुनिया ।

क्या मुझे ज़ख़्म नए दे के अभी जी न भरा,
क्यों मुझे यार बनाने पे तुली है दुनिया ।

मैं किसी फूल की पंखुरी पे पड़ी शबनम हूँ,
मुझको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।

नन्हे बच्चों से 'कुँअर ' छीन के भोला बचपन,
उनको हुशियार बनाने पे तुली है दुनिया ।

Saturday, 21 November 2015

फ़िराक़ गोरखपुरी-(होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाये हुए-से हैं )

होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाये हुए-से हैं
अहले-नज़र ये चोट भी खाये हुए-से हैं

वो तूर हो कि हश्रे-दिल अफ़्सुर्दगाने-इश्क[1]
हर अंजुमन में आग
लगाये-हुए-से हैं

सुब्हे-अज़ल को यूँ ही ज़रा मिल गयी थी आंख
वो आज तक निगाह
चुराये-हुए-से हैं

हम बदगु़माने-इश्क तेरी बज़्मे - नाज से
जाकर भी तेरे सामने
आये-हुए-से हैं

ये क़ुर्बो-बोद[2] भी हैं सरासर फ़रेबे-हुस्ने
वो आके भी फ़िराक़ न आए-हुए-से हैं
शब्दार्थ:
1-प्रेम में दुखी लोग
2-सा‍मीप्य एवं दूरी

दुष्यंत कुमार---(पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं)

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं

बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं

आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर
आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की अस्लियत
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं

Thursday, 19 November 2015

अजीत सुखदेव---(मयस्सर हो जो लम्हा देखने को )

मयस्सर हो जो लम्हा देखने को
किताबों में है क्या क्या देखने को.

हज़ारों क़द्द-ए-आदम आईने हैं
मगर तरसोगे चेहरा देखने को.

अभी हैं कुछ पुरानी यादगारें
तुम आना शहर मेरा देखने को.

फिर उस के बाद था ख़ामोश पानी
के लोग आए थे दरिया देखने को.

हवा से ही खुलता था अक्सर
मुझे भी इक दरीचा देखने को.

क़यामत का है सन्नाटा फ़ज़ा में
नहीं कोई परिंदा देखने को.

अभी कुछ फूल हैं शाख़ों  पे
मुझे काँटों में उलझा देखने को.

गोपालदास "नीरज"---(हर दर्पन तेरा दर्पन है)

हर दर्पन तेरा दर्पन है, हर चितवन तेरी चितवन है,
मैं किसी नयन का नीर बनूँ, तुझको ही अर्घ्य चढ़ाता हूँ !


नभ की बिंदिया चन्दावाली, भू की अंगिया फूलोंवाली,
सावन की ऋतु झूलोंवाली, फागुन की ऋतु भूलोंवाली,
कजरारी पलकें शरमीली, निंदियारी अलकें उरझीली,
गीतोंवाली गोरी ऊषा, सुधियोंवाली संध्या काली,
हर चूनर तेरी चूनर है, हर चादर तेरी चादर है,
मैं कोई घूँघट छुऊँ, तुझे ही बेपरदा कर आता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


यह कलियों की आनाकानी, यह अलियों की छीनाछोरी,
यह बादल की बूँदाबाँदी, यह बिजली की चोराचारी,
यह काजल का जादू-टोना, यह पायल का शादी-गौना,
यह कोयल की कानाफूँसी, यह मैना की सीनाज़ोरी,
हर क्रीड़ा तेरी क्रीड़ा है, हर पीड़ा तेरी पीड़ा है,
मैं कोई खेलूँ खेल, दाँव तेरे ही साथ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


तपसिन कुटियाँ, बैरिन बगियाँ, निर्धन खंडहर, धनवान महल,
शौकीन सड़क, गमग़ीन गली, टेढ़े-मेढ़े गढ़, गेह सरल,
रोते दर, हँसती दीवारें नीची छत, ऊँची मीनारें,
मरघट की बूढ़ी नीरवता, मेलों की क्वाँरी चहल-पहल,
हर देहरी तेरी देहरी है, हर खिड़की तेरी खिड़की है,
मैं किसी भवन को नमन करूँ, तुझको ही शीश झुकाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


पानी का स्वर रिमझिम-रिमझिम, माटी का रव रुनझुन-रुनझुन,
बातून जनम की कुनुनमुनुन, खामोश मरण की गुपुनचुपुन,
नटखट बचपन की चलाचली, लाचार बुढ़ापे की थमथम,
दुख का तीखा-तीखा क्रन्दन, सुख का मीठा-मीठा गुंजन,
हर वाणी तेरी वाणी है, हर वीणा तेरी वीणा है,
मैं कोई छेड़ूँ तान, तुझे ही बस आवाज़ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


काले तन या गोरे तन की, मैले मन या उजले मन की,
चाँदी-सोने या चन्दन की, औगुन-गुन की या निर्गुन की,
पावन हो या कि अपावन हो, भावन हो या कि अभावन हो,
पूरब की हो या पश्चिम की, उत्तर की हो या दक्खिन की,
हर मूरत तेरी मूरत है, हर सूरत तेरी सूरत है,
मैं चाहे जिसकी माँग भरूँ, तेरा ही ब्याह रचाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है!!

Tuesday, 10 November 2015

गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल'--(पर्व )

धरती पर उतर आया जैसे सितारों का कारवां
टूटते तारों का उल्कापात सा आभास
आकाश में जाते पटाखों से फूटता प्रकाश
टिमटिमाते दीपों से लगती
झिलमिलाते सितारों की दीप्ति
दूर तक दीपवालियों से नहाई हुई
उज्जवल वीथियाँ
लगती आकाशगंगा सी पगडंडिया
एक अनोखा पर्व
जिसने पैदा कर दिया
पृथ्वी पर एक नया ब्रह्माण्ड
सूर्य, चंद्र और आकाश भी दिग्भ्रमित
सैकडों प्रकाशवर्ष दूर यह कैसा प्रकाश
धरती पर उतर आया आकाश
सितारों को कैसे चुरा लिया पृथ्वी ने मेरे आँगन से
चाँद ने भी सुना कि चुरा लिया है चांदनी को
और अप्रितम सौंदर्य का प्रतिमान बनी है धरा
उसकी चांदनी को ओढे
पीछे पीछे दौड़ा आया क्षितिज के उस पार से सूर्य
किसने किया दर्प चूर उसका
रात में फैला यह अभूतपूर्व उजास
नहीं हो सकता यह चाँद का प्रयास
ओह ! चाँद का प्रतिरूप
धरती का यह अनोखा रूप
पर्वों का लोक पृथ्वी
जहाँ हर ऋतु में नृत्य करती धरा
कभी वासंती, कभी हरीतिमा, कभी श्वेतवसना वसुंधरा
अथक यात्रा में संलग्न धरा
तुम धन्य हो !
अमर रहे
मेरे प्रकाश से कहीं ऊर्जस्वी तुम्हारा यह पर्व
मैं अनंत काल तक दूँगा तुम्हें प्रकाश
चाँद बोला- मैं भी अनंतकाल तक बिखेरूँगा शीतलता
धरा है, तो है हमारा अस्तित्व
हलाहल से भरे रत्नानिधि के आगोश में
नीलवर्ण अस्तित्व
दिनकर के आतप से तप कर
स्वर्णिम बना तुम्हारा अस्तित्व
स्वत्वाधिकार है तुम्हें मनाने का
यह प्रकाश पर्व.