कौन कहता है कि हम बेसरो-सामाँ[1] निकले
बज़्म से आज भी हम हश्र-बदामाँ[2] निकले
यह न हो ख़ाना-ए-दिल शहरे-ख़मोशाँ निकले
क्या ज़रूरी है कि जो क़तरा है तूफ़ाँ निकले
इब्ने-आदम[3] की तरक्की का भरम टूट गया
हम जिन्हें शहर समझते थे बियाबाँ निकले
हमने सहरा की ख़मोशी को भी बख़्शा है कलाम
आप गुलशन से भी अंगुश्त-बदन्दाँ[4] निकले
हिज्र की रात पे बरसात का होता था गुमाँ
अश्क़ भी आज मेरी शान के शायाँ निकले
वक़्त ने ख़ूब निकाले थे हमारे कस-बल
शुक्र ये है कि करम तेरे फ़रावाँ निकले
जा बसूँ आलमे-इम्काँ से परे जन्नत में
तेरी जन्नत न कहीं आलमे-इम्काँ निकले
मंज़िले-ज़ीस्त ने जब ढूँढना चाहा मुझको
हम ख़िज़ाँ में भी कहीं ग़र्क़े-बहाराँ निकले
आड़े आ जाता है अंगुश्ते-नुमाई [5] का ख़याल
वरना ये ज़िंदगी और हमसे गुरेज़ाँ निकले
तेरी रहमत का तो हक़दार नहीं मैं यारब
दे मुझे जितनी भी अब फ़ुर्सते-असियाँ[6] निकले
जिन को देखा था सितारों से उलझते शब को
सुबह देखा तो हमारे ही वो अरमाँ निकले
ख़ाक-पोशी ही गुनाहों का सबब है ऐ ‘चाँद’
ज़िन्दगी ख़ाक के परदे से भी उरियाँ निकले
शब्दार्थ:
1-ख़ाली हाथ
2-झगड़ा करके
3-आदम के बेटे
4-ठेंगा दिखाते हुए
5-अँगूठा दिखाने
6-पाप की फ़ुर्सत
बज़्म से आज भी हम हश्र-बदामाँ[2] निकले
यह न हो ख़ाना-ए-दिल शहरे-ख़मोशाँ निकले
क्या ज़रूरी है कि जो क़तरा है तूफ़ाँ निकले
इब्ने-आदम[3] की तरक्की का भरम टूट गया
हम जिन्हें शहर समझते थे बियाबाँ निकले
हमने सहरा की ख़मोशी को भी बख़्शा है कलाम
आप गुलशन से भी अंगुश्त-बदन्दाँ[4] निकले
हिज्र की रात पे बरसात का होता था गुमाँ
अश्क़ भी आज मेरी शान के शायाँ निकले
वक़्त ने ख़ूब निकाले थे हमारे कस-बल
शुक्र ये है कि करम तेरे फ़रावाँ निकले
जा बसूँ आलमे-इम्काँ से परे जन्नत में
तेरी जन्नत न कहीं आलमे-इम्काँ निकले
मंज़िले-ज़ीस्त ने जब ढूँढना चाहा मुझको
हम ख़िज़ाँ में भी कहीं ग़र्क़े-बहाराँ निकले
आड़े आ जाता है अंगुश्ते-नुमाई [5] का ख़याल
वरना ये ज़िंदगी और हमसे गुरेज़ाँ निकले
तेरी रहमत का तो हक़दार नहीं मैं यारब
दे मुझे जितनी भी अब फ़ुर्सते-असियाँ[6] निकले
जिन को देखा था सितारों से उलझते शब को
सुबह देखा तो हमारे ही वो अरमाँ निकले
ख़ाक-पोशी ही गुनाहों का सबब है ऐ ‘चाँद’
ज़िन्दगी ख़ाक के परदे से भी उरियाँ निकले
शब्दार्थ:
1-ख़ाली हाथ
2-झगड़ा करके
3-आदम के बेटे
4-ठेंगा दिखाते हुए
5-अँगूठा दिखाने
6-पाप की फ़ुर्सत

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