Friday, 8 April 2016

जगदीश जोशी ‘साधक’---(मैं अपने आप से हूँ महव ए गुफ़्तगू अब तक)

मैं अपने आप से हूँ महव ए गुफ़्तगू अब तक
मेरा ही चेहरा है बस मेरे रूबरू अब तक

न हाथ जामादरी से उठाए वहशत ने
न अपना चाक ए गरेबान हुआ रफ़ू अब तक

जमूद ए कुह्नगी ए ख़ुमकदा, अरे तोबा !
वही है रिन्द, वही मय, वही सुबू अब तक

हुआ ज़माना कि दम भर को बरक़ चमकी थी
कलीम ओ तूर की बाक़ी है गुफ़्तगू अब तक

हुनूज़ मेरे तआक्क़ुब में है ग़म ए दुनिया
हुई है ख़त्म कहाँ मेरी जुस्तजू अब तक

हुजूम ए यास ने कोशिश तो की , मगर न छुटा
खिज़ां के हाथ से दामान ए आरज़ू अब तक

ये किस बगूले के चक्कर में है दिल ए नादाँ
ख़राब ए दस्त बा उन्वान ए जुस्तजू अब तक

जफ़ा ओ ज़ुल्म का अब अपने जायज़ा कर ले
न पूछ मुझ से , वफ़ा क्यूँ है मेरी ख़ू अब तक

बदल चुका है ज़माना मगर ‘साधक’ साहिब
न बदला आपका अंदाज़ ए गुफ़्तगू अब तक

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